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300 Years Old Temple Tradition (Image Source: Social Media)
300 Years Old Temple Tradition (Image Source: Social Media)
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Ratlam Mahalakshmi Temple: अनोखा मंदिर जहा प्रसाद के रूप मे मिलते है पैसे, वजह जानकार हैरान रह जाएंगे आप

Ratlam Mahalakshmi Temple: मध्य प्रदेश के रतलाम स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर में दिवाली के बाद प्रसाद के रूप में रुपये-पैसे बांटने की अनोखी परंपरा है। करीब 300 साल पुरानी मानी जाने वाली इस परंपरा के तहत भाई दूज पर भक्तों को धनराशि दी जाती है।

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प्रकाशित: 02 Nov 2026, 05:30 PM · 3 मिनट पढ़ने का समय
मध्य प्रदेश
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Ratlam Mahalakshmi Temple: मंदिरों में माथा टेकने के बाद अमूमन हमें प्रसाद के रूप में मिठाई, फल या पंचामृत ही मिलता है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जहाँ भगवान का प्रसाद नोट और सिक्के होते हैं? जी हाँ, हमारे देश में एक ऐसा मंदिर भी है जहाँ दीपावली के पावन अवसर पर प्रसाद के तौर पर भक्तों को रूपए -पैसे बांटे जाते हैं। आइए जानते हैं इस अनोखी जगह और परंपरा के बारे में विस्तार से।

जगमगाता माणक चौक और महालक्ष्मी का दरबार 

मध्य प्रदेश के रतलाम शहर के व्यस्त माणक चौक इलाके में स्थित देवी महालक्ष्मी का यह प्राचीन मंदिर अपनी भव्यता और अनोखी रस्मों के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। दीपावली और भैया दूज के पावन दिनों में इस मंदिर की छटा देखने लायक होती है। इन दिनों में पूरे मंदिर को दीपों और फूलों के साथ-साथ करंसी नोटों व सोने-चांदी के गहनों से सजाया जाता है। भक्तगण भी बड़ी श्रद्धा के साथ अपनी ओर से माता के चरणों में नकदी, आभूषण और कीमती सिक्के अर्पित करते हैं।
इस मंदिर की सबसे खास बात प्रसाद बांटने की परंपरा है। भाई दूज पर यहां सुबह से ही भक्तों का पहुंचना शुरू हो जाता है। श्रद्धालु प्रसाद के रूप में मिलने वाली धनराशि को श्रद्धापूर्वक अपने घर ले जाते हैं। स्थानीय मान्यता है कि मंदिर से मिले इन रूपए को घर की तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रखने से सुख-समृद्धि और बरकत बनी रहती है। यही वजह है कि भक्त हर साल इस विशेष प्रसाद को पाने के लिए मंदिर पहुंचते हैं।

माता के साथ कुबेर देव का आशीर्वाद 

इस ऐतिहासिक मंदिर की एक और खास विशेषता यह है कि यहाँ माँ लक्ष्मी के साथ धन के देवता भगवान कुबेर भी विराजमान हैं। यही वजह है कि दीपावली की रात यहाँ विशेष पूजा-अर्चना करने के लिए भक्तों का भारी सैलाब उमड़ता है। लोगों का मानना है कि इन दोनों देव-शक्तियों के आशीर्वाद से न सिर्फ आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं, बल्कि घर में सुख-समृद्धि का वास भी होता है।

300 साल पुराना इतिहास और रियासतकाल की यादें 

यह परंपरा कोई नई नहीं है, बल्कि जानकारों के मुताबिक यह करीब 300 साल पुरानी रियासतकालीन परंपरा है। रतलाम शहर की स्थापना करने वाले महाराजा रतन सिंह राठौर के समय से ही यह प्रथा चली आ रही है। कहा जाता है कि राजा दीपावली और धनतेरस के खास मौके पर माता के दरबार में अपने शाही खजाने से सोने, चांदी के आभूषण और मुद्राएँ श्रृंगार के लिए भेजा करते थे। समय के साथ यह शाही परंपरा जन-उत्सव में बदल गई और तब से लेकर आज तक यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं में खजाने का धन प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता रहा है।
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