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Diwali Religious Significance (Image Source: AI Generated)
Diwali Religious Significance (Image Source: AI Generated)
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History of Deepawali: आखिर क्यों मनाई जाती है दीपावली, जानिए रामायण और पुराणों की मान्यताएं

History of Deepawali: दीपावली का पर्व भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की मान्यता से जुड़ा है। रामायण में उनकी वापसी और अयोध्यावासियों द्वारा किए गए स्वागत का वर्णन मिलता है, जबकि पुराणों में दीपदान और मां लक्ष्मी की पूजा का महत्व बताया गया है।

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प्रकाशित: 02 Nov 2026, 04:39 PM · 4 मिनट पढ़ने का समय
भारत
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
History of Deepawali: दीपावली का नाम आते ही मन में जगमगाते दीपक, रोशनी से सजे घर और भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी की तस्वीर उभरने लगती है। भारतीय परंपरा में इस पर्व को भगवान राम के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दीपों से रोशन कर दिया था। हालांकि, दीपावली की परंपरा को समझने के लिए रामायण के साथ-साथ पुराणों में मिलने वाले उल्लेखों पर भी नजर डालना जरूरी है।

भगवान राम की अयोध्या वापसी और दीपावली की मान्यता 

रामायण के अनुसार, राजा दशरथ के वचन का पालन करने के लिए भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास स्वीकार करना पड़ा था। इस दौरान उनकी पत्नी माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वन में रहे। वनवास के दौरान रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया था। इसके बाद भगवान राम ने हनुमान, सुग्रीव और वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई की और रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया। वनवास की अवधि पूरी होने के बाद भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे। वाल्मीकि रामायण में उनके लौटने के प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है। भगवान राम पुष्पक विमान से अपने साथियों के साथ अयोध्या की ओर रवाना हुए थे। इस बीच भरत नंदीग्राम में रहकर अयोध्या का शासन संभाल रहे थे। उन्होंने भगवान राम की अनुपस्थिति में उनकी पादुकाओं को राजसिंहासन पर स्थापित किया था। राम के लौटने की सूचना मिलते ही भरत और अयोध्यावासी उनके स्वागत के लिए उत्साहित हो उठे। दोनों भाइयों का मिलन हुआ और भरत ने राजपाट वापस राम को सौंप दिया। इसके बाद भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ।

क्या रामायण में दीप जलाने का स्पष्ट उल्लेख है? 
दीपावली को भगवान राम की वापसी से जोड़ने वाली मान्यता उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रचलित है। लोकपरंपरा के अनुसार, 14 वर्षों बाद अपने प्रिय राजा को वापस पाकर अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। समय के साथ यह प्रसंग दीपावली के उत्सव का प्रमुख आधार बन गया। हालांकि, इस विषय में एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है। मूल वाल्मीकि रामायण में भगवान राम की अयोध्या वापसी के दौरान पूरे नगर में दीपकों की कतारें जलाकर दीपावली मनाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। ग्रंथ में नगर को सजाने, स्वागत की तैयारियों, तोरण, पुष्पमालाओं, ध्वजा-पताकाओं और सुगंधित सामग्रियों से वातावरण को उत्सवमय बनाने का वर्णन मिलता है। इसलिए दीप जलाकर राम के लौटने का उत्सव मनाने की परंपरा को रामायण में दर्ज किसी स्पष्ट प्रसंग के बजाय बाद में विकसित हुई धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है।

पुराणों में दीपदान और लक्ष्मी पूजा का महत्व 

दीपावली का धार्मिक महत्व केवल भगवान राम की अयोध्या वापसी तक सीमित नहीं है। अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में इस पर्व के अन्य संदर्भ भी मिलते हैं। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में कार्तिक मास, दीपदान और धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व बताया गया है। कार्तिक अमावस्या के अवसर पर दीप जलाने और मां लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा भी इसी धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है। इसी कारण दीपावली को अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न धार्मिक मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। कहीं इसे भगवान राम की वापसी का उत्सव माना जाता है, तो कहीं मां लक्ष्मी की आराधना और सुख-समृद्धि की कामना का पर्व।

आस्था, परंपरा और रोशनी का प्रतीक है दीपावली 

दीपावली की परंपरा सदियों के दौरान कई धार्मिक कथाओं और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ती चली गई। भगवान राम की विजय और अयोध्या वापसी की कथा ने इस पर्व को विशेष पहचान दी। वहीं, पुराणों में वर्णित दीपदान और लक्ष्मी पूजा ने इसके धार्मिक महत्व को और व्यापक बनाया। आज दीपावली केवल दीप जलाने या उत्सव मनाने का अवसर नहीं है। यह धर्म की अधर्म पर विजय, आशा की निराशा पर जीत और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश भी देती है। यही वजह है कि अलग-अलग मान्यताओं के बावजूद दीपावली भारतीय संस्कृति में आस्था, उल्लास और एकता का प्रमुख पर्व बनी हुई है।
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