History of Bastar Dussehra: भारत के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर रावण दहन और रामलीला प्रमुख आकर्षण होते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरे की परंपरा इन सबसे अलग है। यहां यह पर्व मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा, आदिवासी परंपराओं और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक माना जाता है। बस्तर दशहरे की खासियत यह है कि इसका आयोजन केवल विजयादशमी तक सीमित नहीं रहता। कई सप्ताह तक चलने वाले इस उत्सव में अलग-अलग दिनों पर विशेष धार्मिक और पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं। इसकी सबसे बड़ी पहचान विशाल लकड़ी का रथ, उसे खींचने वाले श्रद्धालु और पीढ़ियों से चली आ रही अनूठी परंपराएं हैं।
कौन हैं मां दंतेश्वरी, जिनकी आराधना से जुड़ा है बस्तर दशहरा?
मां दंतेश्वरी को बस्तर अंचल की आराध्य देवी माना जाता है। स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था में उनका विशेष स्थान है और उन्हें मां दुर्गा के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सती का एक दांत इस स्थान पर गिरा था। इसी मान्यता से देवी का नाम दंतेश्वरी पड़ा। दंतेवाड़ा स्थित मां दंतेश्वरी का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम के निकट स्थित है। बस्तर दशहरे में देवी की आराधना और उनसे जुड़ी परंपराएं केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। यही वजह है कि यहां दशहरे का स्वरूप देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव से काफी अलग दिखाई देता है।
विशाल रथ है बस्तर दशहरे का सबसे बड़ा आकर्षण
बस्तर दशहरे के दौरान निकलने वाला विशाल लकड़ी का रथ इस पर्व की प्रमुख पहचान है। पारंपरिक तरीके से तैयार किए जाने वाले इस रथ के निर्माण में स्थानीय कारीगरों और विभिन्न गांवों के लोगों की अहम भूमिका होती है। परंपरा के अनुसार, रथ के लिए लकड़ी, उसके निर्माण में काम आने वाले कारीगर और उसे खींचने के लिए रस्सियों की व्यवस्था अलग-अलग क्षेत्रों के लोग मिलकर करते हैं। इससे इस आयोजन में सामुदायिक सहयोग और स्थानीय परंपराओं की झलक मिलती है। रथ को खींचने के दौरान बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं। इस रस्म से जुड़ी परंपराओं में माड़िया आदिवासी समुदाय और किलेपाल परगना का विशेष उल्लेख मिलता है। रथ खींचने की परंपरा बस्तर दशहरे को धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है।लगभग 600 साल पुरानी परंपरा से जुड़ा है इतिहास
बस्तर दशहरे की रथ परंपरा को लेकर एक प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता राजा पुरुषोत्तम देव से जुड़ी है। कहा जाता है कि लगभग छह सौ साल पहले बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। इस यात्रा के बाद पुरी के राजा की ओर से उन्हें एक रथ भेंट किए जाने की कथा प्रचलित है। इसी कथा को बस्तर दशहरे में रथ निकालने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। समय के साथ यह आयोजन स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और आदिवासी संस्कृति के साथ जुड़ता गया और आज बस्तर की विशिष्ट पहचान बन चुका है।
नौ दिनों तक साधना करते हैं जोगी
बस्तर दशहरे में जोगी से जुड़ी परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। इस दौरान एक साधक नौ दिनों तक गड्ढे में बैठकर साधना करता है। यह अनुष्ठान पर्व की आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा माना जाता है। इस रस्म के माध्यम से दशहरे के धार्मिक पक्ष और स्थानीय मान्यताओं की झलक देखने को मिलती है। बस्तर दशहरे में ऐसी कई परंपराएं हैं, जो इसे सामान्य उत्सव से अलग पहचान देती हैं।छोटी बच्ची की अनुमति से जुड़ी है अनूठी रस्म
बस्तर दशहरे की एक अन्य विशेष परंपरा में छोटी बच्ची को देवी के स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है। उससे संबंधित रस्मों को पूरा करने के बाद उत्सव की अगली प्रक्रियाएं आगे बढ़ाई जाती हैं। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में इस परंपरा को देवी के प्रति श्रद्धा और कन्या के महत्व से जोड़कर देखा जाता है। यह रस्म बस्तर दशहरे की उन विशिष्ट परंपराओं में शामिल है, जो पीढ़ियों से स्थानीय समाज का हिस्सा बनी हुई हैं।
रथ परिक्रमा से भीतर रैनी तक, हर रस्म का अपना महत्व
बस्तर दशहरे के दौरान अलग-अलग चरणों में कई पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं। फूलों से सजाए गए रथ की परिक्रमा और मोटी रस्सियों से उसे खींचने का दृश्य इस पर्व का प्रमुख आकर्षण होता है। काचन गादी की रस्म में काचन और रैला माता की पूजा की जाती है। इस अनुष्ठान को पर्व के सफल आयोजन की कामना से जोड़कर देखा जाता है। वहीं, भीतर रैनी के दौरान रथ को जंगल में छिपाने की परंपरा निभाई जाती है। इन रस्मों के माध्यम से बस्तर की धार्मिक मान्यताओं, लोक परंपराओं और सामुदायिक जीवन की झलक मिलती है। उत्सव के अंतिम चरण में मां दंतेश्वरी से जुड़ी परंपराओं के साथ आयोजन का समापन होता है।देशभर के दशहरे से अलग क्यों है बस्तर का दशहरा?
बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जहां देश के अनेक हिस्सों में दशहरा रामलीला और रावण दहन के लिए जाना जाता है, वहीं बस्तर में मां दंतेश्वरी की आराधना, आदिवासी परंपराएं और सामूहिक भागीदारी इस उत्सव का आधार हैं। लगभग 75 दिनों तक चलने वाली इसकी परंपरा बस्तर की ऐतिहासिक विरासत और स्थानीय समाज की आस्था को दर्शाती है। विशाल रथ से लेकर जोगी की साधना तक, यहां की हर रस्म इस पर्व को एक अलग पहचान देती है।







