दुनिया भर में करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाला मलेरिया आज भी वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है। चिकित्सा विज्ञान में लगातार प्रगति के बावजूद यह बीमारी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में व्यापक रूप से फैली हुई है हर साल लाखों लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं और हजारों लोगों की जान चली जाती है। दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध और पूरी तरह प्रभावी वैक्सीन की कमी ने वैज्ञानिकों को नए समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया है इसी दिशा में अब शोधकर्ता पारंपरिक प्रयोगशाला मॉडल्स से आगे बढ़कर अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, जो मलेरिया के इलाज और रोकथाम में नई संभावनाएं खोल सकती हैं। हाल ही में प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययनों में बताया गया है कि माइक्रोफिजियोलॉजिकल सिस्टम और स्टेम सेल आधारित ऊतक मॉडल्स मलेरिया अनुसंधान को नई दिशा दे रहे हैं। इन तकनीकों की मदद से वैज्ञानिक मानव शरीर में परजीवी के व्यवहार को पहले की तुलना में कहीं अधिक सटीकता से समझ पा रहे हैं।
मलेरिया
मलेरिया एक संक्रामक बीमारी है, जो प्लाज्मोडियम नामक परजीवी के कारण होती है यह संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष करोड़ों लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं मलेरिया की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसका परजीवी जीवन चक्र बेहद जटिल होता है। यह पहले मानव शरीर के लीवर में पहुंचता है और वहां बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होता है। इसके बाद यह रक्त कोशिकाओं पर हमला करता है, जिससे बुखार, ठंड लगना, कमजोरी और अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
लीवर में जीवन चक्र
वैज्ञानिकों के अनुसार मलेरिया परजीवी का जीवन चक्र बीमारी के विकास का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है यही वह समय होता है जब संक्रमण शरीर में स्थापित होता है, लेकिन मरीज को कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते प्रयोगशाला में इस चरण को पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं रहे हैं। यही वजह है कि कई संभावित दवाएं परीक्षणों में सही परिणाम नहीं दे पातीं।
ट्रेडिसनल मॉडल
कई दशकों से मलेरिया अनुसंधान मुख्य रूप से 2D सेल कल्चर और पशु मॉडल्स पर आधारित है इन प्रणालियों ने वैज्ञानिकों को काफी जानकारी दी, लेकिन इनमें मानव शरीर जैसी वास्तविक परिस्थितियां मौजूद नहीं होतीं सेल कल्चर में कोशिकाएं सपाट सतह पर विकसित की जाती हैं, जबकि मानव शरीर में कोशिकाएं त्रि-आयामी वातावरण में काम करती हैं। इसके कारण कई बार प्रयोगशाला में मिलने वाले परिणाम वास्तविक मरीजों की स्थिति से मेल नहीं खाते।
नई तकनीक
शोधकर्ता अब माइक्रोफिजियोलॉजिकल सिस्टम और स्टेम सेल आधारित ऊतक मॉडल्स का उपयोग कर रहे हैं इन प्रणालियों को अक्सर ऑर्गन-ऑन-ए-चिप तकनीक भी कहा जाता है इनमें मानव अंगों के सूक्ष्म मॉडल तैयार किए जाते हैं, जो वास्तविक अंगों की तरह व्यवहार करते हैं। इससे वैज्ञानिक यह देख सकते हैं कि मलेरिया परजीवी मानव लीवर और रक्त कोशिकाओं के साथ किस प्रकार संपर्क करता है यह तकनीक दवाओं के परीक्षण को अधिक सटीक बनाने में मदद करेगी।
दवा खोज की प्रक्रिया
नई प्रयोगशाला तकनीकों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि संभावित दवाओं की जांच पहले से कहीं अधिक तेजी और सटीकता के साथ की जा सकती है शोधकर्ताओं का कहना है कि इन उन्नत तकनीकों की मदद से उन दवाओं की पहचान करना आसान होगा जो परजीवी के जीवन चक्र को शुरुआती चरण में ही रोक सकती हैं। इससे नई दवाओं के विकास में लगने वाला समय और लागत दोनों कम हो सकते हैं।
वैक्सीन
मलेरिया के खिलाफ पूरी तरह प्रभावी वैक्सीन विकसित करना वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। परजीवी के जटिल जीवन चक्र के कारण वैक्सीन विकास की प्रक्रिया कठिन हो जाती है नई तकनीकों के माध्यम से वैज्ञानिक यह बेहतर ढंग से समझ सकेंगे कि मानव इम्मुन सिस्टम परजीवी के खिलाफ कैसे प्रतिक्रिया करती है इससे अधिक प्रभावी वैक्सीन तैयार करने में मदद मिलेगी।
