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परिसीमन बिल
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मास्टरप्लान : 543 से बढ़कर 824 होंगी लोकसभा सीटें, EAC-PM के फॉर्मूले से बदलेगा देश का सियासी नक्शा!

हालिया विधानसभा चुनावों के बाद केंद्र सरकार के लिए लंबे समय से चर्चा में रहे परिसीमन (Delimitation) विधेयक को आगे बढ़ाने की संभावनाएं बढ़ती दिखाई जा रही हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के एक वर्किंग पेपर में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 824 करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके तहत देश के 170 बड़े लोकसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जाएगा, जिसमें 111 सीटों को तीन हिस्सों और 59 सीटों को दो हिस्सों में विभाजित करने की योजना है।

कीर्तिमान न्यूज
12 Jun 2026, 10:13 AM
नई दिल्ली

हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति की दशा और दिशा बदल दी है। इन चुनावी परिणामों से उत्साहित केंद्र की सत्ताधारी बीजेपी के हौसले बुलंद हैं। यही वजह है कि जिस 'परिसीमन बिल' को सरकार राजनीतिक गतिरोध के कारण अप्रैल में संसद से पास नहीं करवा सकी थी, अब उसे नए सिरे से लाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।

इसी बीच, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के एक वर्किंग पेपर ने भविष्य की संसद का पूरा खाका (ब्लूप्रिंट) खींच दिया है। इस प्रस्ताव के तहत देश में लोकसभा सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 824 करने की तैयारी है।

170 बड़ी सीटों का होगा ऑपरेशन

आमतौर पर माना जाता है कि परिसीमन होने पर पूरे देश की सीटों का ढांचा बदल जाएगा, लेकिन EAC-PM का सुझाव बेहद व्यावहारिक है। टाइम्स ऑफ इंडिया (ToI) की रिपोर्ट के अनुसार, परिषद के सदस्य शमिका रवि और मुदित कपूर द्वारा तैयार किए गए इस वर्किंग पेपर में सिर्फ 170 बड़े लोकसभा क्षेत्रों के विभाजन की बात कही गई है।

विभाजन का गणित (111 बनाम 59 सीटों का फॉर्मूला):

  • 111 सीटें तीन भागों में बंटेंगी: देश के सबसे बड़े 111 लोकसभा क्षेत्रों को 3-3 नए निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाएगा।

  • 59 सीटें दो भागों में बंटेंगी: 59 बड़े क्षेत्रों को काटकर 2-2 लोकसभा सीटें बनाई जाएंगी।

  • महिला आरक्षण का रास्ता होगा साफ: इस फॉर्मूले का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि मौजूदा हर लोकसभा सीट को छेड़े बिना ही सीटों की संख्या बढ़ जाएगी, जिससे 33% महिला आरक्षण को लागू करना बेहद आसान हो जाएगा।

🗳️ वोटर टर्नआउट में बंपर उछाल का अनुमान > रिपोर्ट के मुताबिक, यदि इस मॉडल पर परिसीमन होता है तो 2029 के आम चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी (Voter Turnout) में 0.3% से 2.3% तक की बढ़ोतरी देखी जा सकती है। संख्या के लिहाज से यह इजाफा करीब 90 लाख से 2.3 करोड़ नए वोटों के रूप में सामने आएगा।

बंगाल और तमिलनाडु के नतीजों ने पलटा पासा

अप्रैल महीने में जब इस बिल को लाने की कोशिश हुई थी, तब विपक्ष (विशेषकर टीएमसी और डीएमके) के भारी विरोध के कारण सरकार कदम पीछे खींचने पर मजबूर हुई थी। लेकिन हालिया विधानसभा चुनावों ने समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं:

  • पश्चिम बंगाल: बीजेपी ने यहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सत्ता से बेदखल कर करारी शिकस्त दी है। चूंकि अप्रैल में टीएमसी ही इस बिल के विरोध की मुख्य धुरी थी, इसलिए अब ममता बनर्जी का राजनीतिक दबाव कमजोर पड़ चुका है।

  • तमिलनाडु: यहां भी डीएमके (DMK) गठबंधन की करारी हार के बाद सियासी समीकरण बदल गए हैं। कांग्रेस और डीएमके का विरोध अब संसद में उतना असरदार नहीं रहेगा। यदि विपक्ष वोटिंग का बहिष्कार (बायकॉट) भी करता है, तो भी सरकार आसानी से बिल पास करा लेगी।

"दो-तिहाई बहुमत आते ही लाएंगे बिल" > बीजेपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने स्पष्ट संकेत देते हुए कहा है कि जैसे ही संसद में सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा सुनिश्चित होगा, मोदी सरकार बिना किसी हिचकिचाहट के इस ऐतिहासिक परिसीमन विधेयक को पटल पर रख देगी।

किस राज्य के हिस्से कितनी सीटें?

EAC-PM के इस मॉडल में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन को बनाए रखने की कोशिश की गई है। आइए देखते हैं कि नए परिसीमन के बाद राज्यों की सीटों में कितना बड़ा बदलाव आएगा:

दक्षिण भारत के राज्यों में सीटों का विस्तार

दक्षिण के राज्यों में मुख्य रूप से 59 सीटों को दो भागों में बांटने का प्रस्ताव है, जिसमें अकेले केरल और तमिलनाडु की 22 सीटें शामिल हैं।

राज्यमौजूदा सीटेंपरिसीमन के बाद संभावित सीटें
तमिलनाडु3959
कर्नाटक2842
केरल2030
तेलंगाना1726

उत्तर और पश्चिमी भारत के राज्यों में महा-विस्फोट

जिन 111 सीटों को तीन भागों में बांटने का प्रस्ताव है, उनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी उत्तर प्रदेश (17 सीटें), महाराष्ट्र (12 सीटें), बिहार (10 सीटें) और पश्चिम बंगाल (10 सीटें) की है।

राज्यमौजूदा सीटेंपरिसीमन के बाद संभावित सीटें
उत्तर प्रदेश80120
महाराष्ट्र4872
बिहार4060
मध्य प्रदेश2944
गुजरात2639
राजस्थान2538

क्यों जरूरी है यह बदलाव?

भारत में आखिरी बार सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर हुआ था। तब से लेकर अब तक देश की आबादी और वोटर्स की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हो चुकी है। कई सांसदों के पास 25 से 30 लाख की आबादी को संभालने की जिम्मेदारी है, जिससे विकास कार्य प्रभावित होते हैं।

EAC-PM का यह नया फॉर्मूला न केवल प्रशासनिक रूप से देश को छोटे और प्रभावी निर्वाचन क्षेत्र देगा, बल्कि लोकतंत्र में हर नागरिक के वोट की कीमत को भी समान बनाएगा। अब देखना यह है कि नई राजनीतिक ताकत के साथ मोदी सरकार इस मास्टरप्लान को कब अमलीजामा पहनाती है।

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