ईरान और अमेरिका के बीच जारी अभूतपूर्व तनाव ने दुनिया के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को एक बार फिर बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है। इस वैश्विक टकराव के बीच, जहाजों की आवाजाही बेहद जोखिम भरी हो चुकी है। हालांकि, भारत ने अपने आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने के लिए बैक-चैनल डिप्लोमेसी और एक बेहद कड़े 'साइलेंट ऑपरेशन' के तहत काम शुरू कर दिया है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत सरकार के कई प्रमुख मंत्रालय और खुफिया एजेंसियां 24 घंटे इस रूट पर नजर बनाए हुए हैं। सुरक्षा कारणों और मिशन की संवेदनशीलता को देखते हुए पूरी रणनीति को पूरी तरह से गोपनीय (क्लासिफाइड) रखा गया है, ताकि जहाजों की सुरक्षा में कोई चूक न हो।
ऐसे सुरक्षित निकल रहे हैं भारतीय जहाज
भारत की रणनीति के केंद्र में तीन प्रमुख स्तंभ काम कर रहे हैं:
विदेश मंत्रालय (MEA): ईरान, अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ लगातार कूटनीतिक संपर्क बनाए हुए है ताकि भारतीय फ्लैग वाले जहाजों को 'सुरक्षित रास्ता' (Safe Passage) मिल सके।
पेट्रोलियम और उर्वरक मंत्रालय: यह तय कर रहे हैं कि देश की तात्कालिक जरूरतों के हिसाब से किन तेल और गैस टैंकरों को प्राथमिकता के आधार पर पहले निकाला जाए।
शिपिंग मंत्रालय (शिपिंग महानिदेशालय): जहाजों की रियल-टाइम ट्रैकिंग कर रहा है और कप्तानों को पल-पल की गाइडलाइंस जारी कर रहा है।
ताजा स्थिति: इसी त्रिस्तरीय समन्वय (Three-tier Coordination) का नतीजा है कि हाल के दिनों में कई भारतीय मालवाहक और तेल टैंकर इस अत्यधिक जोखिम भरे क्षेत्र को सुरक्षित पार करने में सफल रहे हैं।
समुद्र में अभी भी लगी है 'लाइफलाइन' की कतार
इस कूटनीतिक सफलता के बावजूद खतरा टला नहीं है। ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य और उसके आसपास के खाड़ी क्षेत्र में भारतीय ध्वज (Indian Flag) वाले कई कमर्शियल जहाज अभी भी कतार में हैं। इनमें शामिल हैं:
कच्चे तेल (Crude Oil) के बड़े टैंकर
एलपीजी (LPG) और एलएनजी (LNG) से लदे पोत
औद्योगिक कच्चे माल से भरे कंटेनर जहाज
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों (विशेषकर कच्चे तेल और गैस) के लिए 80% से अधिक आयात पर निर्भर है, जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी खाड़ी क्षेत्र से आता है। ऐसे में इन जहाजों का सुरक्षित ठहरना या फंसना भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकता है।
वैश्विक बाजार पर चौतरफा दबाव
होर्मुज जलडमरूमध्य केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की 'कंठनाड़ी' है। दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) तेल व्यापार इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। मौजूदा गतिरोध के कारण व्यापार जगत को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:
| चुनौती का क्षेत्र | अर्थव्यवस्था पर प्रभाव |
| बीमा लागत (Insurance Premium) | युद्ध के जोखिम (War Risk Insurance) के कारण जहाजों का बीमा कई गुना बढ़ गया है। |
| मालभाड़ा (Freight Rates) | लंबे रास्तों या देरी की वजह से लॉजिस्टिक्स कंपनियों ने किराया बढ़ा दिया है। |
| ग्लोबल सप्लाई चेन | आपूर्ति में देरी के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है। |
क्या है आगे की राह? बातचीत बेनतीजा
तमाम कूटनीतिक प्रयासों के बाद भी ईरान और अमेरिका के बीच जमी बर्फ पूरी तरह पिघल नहीं पाई है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच पर्दे के पीछे से संवाद और कुछ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों के जरिए बातचीत का सिलसिला जारी है, लेकिन जमीनी हकीकत में तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। दोनों ही देश अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं, जिसके कारण फिलहाल कोई ठोस समाधान निकलता नहीं दिख रहा है।
निष्कर्ष: आने वाले दिन वैश्विक शिपिंग इंडस्ट्री और भारत की आयात रणनीति के लिए बेहद अग्निपरीक्षा वाले होने वाले हैं। देखना होगा कि भारत की यह 'साइलेंट डिप्लोमेसी' कब तक अपने जहाजों को इस सुलगते समुद्री रास्ते से सुरक्षित बाहर निकालने में कामयाब रहती है।
