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पंचायत चुनाव : तीसरे बच्चे पर अयोग्यता मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने देश में पंचायत और अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की अनिवार्यता वाले नियम पर बहुत गंभीर सवाल उठाए हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत का मानना है कि बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए सालों पहले बनाई गई यह नीति अब अपनी उपयोगिता खो चुकी है।

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प्रकाशित: 15 Jul 2026, 04:20 PM · अपडेट: 07 Oct 2026, 09:23 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में 'दो बच्चों का नियम' अब चर्चा का विषय बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादास्पद नीति की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट का मानना है कि देश में घटती फर्टिलिटी रेट को देखते हुए इस नियम पर फिर से विचार जरूरी है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 2003 के अपने पुराने फैसले पर असहमति जताई। बेंच ने कहा कि भारत का डेमोग्राफिक प्रोफाइल पूरी तरह बदल चुका है। आज देश का फर्टिलिटी रेट 1.7 के स्तर पर आ गया है। कई राज्यों में यह स्थिति चिंताजनक रूप से कम हो गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब आबादी रोकने के लिए इस नीति का कोई ठोस आधार नहीं दिखता।

पॉलिसी पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

बेंच ने टिप्पणी की कि अब तीन बच्चे होना एक सामान्य प्रक्रिया है। उन्होंने इस नियम को 'बेकार पॉलिसी' करार दिया और इसे तुरंत वापस लेने का संकेत दिया। कोर्ट ने कहा कि इस नियम का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधी हथियार की तरह करते हैं। इससे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अनावश्यक रूप से अयोग्य ठहराया जा रहा है। मामले में मदद के लिए वकील रुक्मिणी बोबडे को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया है।

पूर्व सरपंच की याचिका से उठा मुद्दा

यह मामला महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका से जुड़ा है। उन्हें तीसरे बच्चे के कारण पंचायत अधिनियम के तहत अयोग्य घोषित कर दिया गया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी उनकी अयोग्यता को बरकरार रखा था। अब सुप्रीम कोर्ट का यह रुख पंचायत चुनाव लड़ने वाले लाखों लोगों के लिए बड़ी राहत ला सकता है।


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