पश्चिम बंगाल की सियासत में इस वक्त एक ऐसा भूचाल आया है जिसने न सिर्फ राज्य बल्कि देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों ने बगावत का बिगुल फूंक दिया है। इन बागी सांसदों ने पार्टी से नाता तोड़कर न सिर्फ अपना एक अलग गुट बनाया है, बल्कि बेहद चौंकाने वाला फैसला लेते हुए एक छोटी सी क्षेत्रीय पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' (NCPI) के साथ अपने इस नए समूह के विलय का ऐलान भी कर दिया है।
इस एक फैसले ने रातों-रात NCPI को देश के राजनीतिक नक्शे पर ला खड़ा किया है। लोग अब गूगल पर इस पार्टी का इतिहास खंगाल रहे हैं, क्योंकि अब तक राजनीतिक गलियारों से दूर आम जनता ने इस पार्टी का नाम तक नहीं सुना था।
NDA में बढ़ेगा इस नई ताकत का कद
इस बड़े उलटफेर के बाद देश की संसद का गणित पूरी तरह बदलने वाला है। टीएमसी के बागी सांसदों के इस कदम से ममता बनर्जी की पार्टी के अस्तित्व और दिल्ली में उनकी राजनीतिक साख पर बड़ा संकट मंडराने लगा है।
दूसरी ओर, केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के लिए यह एक बड़ी खुशखबरी है। NCPI ने पहले ही साफ कर दिया है कि वह एनडीए सरकार का पुरजोर समर्थन करेगी। इस विलय के बाद संसद में समीकरण कुछ इस तरह बदल जाएंगे:
टीडीपी को पछाड़ बनेगी दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी: अब तक लोकसभा में 16 सांसदों के साथ चंद्रबाबू नायडू की तेलगु देशम पार्टी (TDP), बीजेपी के बाद एनडीए की सबसे बड़ी सहयोगी थी। लेकिन 20 सांसदों के आने के बाद अब NCPI, एनडीए की दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरेगी।
ममता गुट को भारी नुकसान: लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाली टीएमसी के लिए यह करारा झटका है, जिससे संसद में उनकी आवाज कमजोर होना तय है।
आखिर क्या है NCPI का इतिहास और वजूद?
जिस पार्टी के पास कल तक न कोई सांसद था और न ही कोई विधायक, वह आज सीधे संसद के पटल पर एक बड़ी ताकत बनने जा रही है। आइए जानते हैं क्या है NCPI का पूरा इतिहास:
1. कहां से ऑपरेट होती है पार्टी?
NCPI मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत के राज्य त्रिपुरा में स्थित एक पंजीकृत (रजिस्टर्ड) लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त छोटी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी है। हालांकि, इसका पंजीकरण पश्चिम बंगाल के हावड़ा (संकराइल) में भी दर्ज है। इस पार्टी का मुख्य राजनीतिक आधार और वोटर बेस बंगाली समुदाय को माना जाता है।
2. चुनावी मैदान में कैसा रहा है प्रदर्शन?
यह पार्टी साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान चुनावी मैदान में उतरी थी। पार्टी ने कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतारे थे, लेकिन तब इसकी जमीन इतनी मजबूत नहीं थी और इसके सभी उम्मीदवारों को करारी हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका था।
3. क्या है NCPI का चुनाव चिह्न?
चुनाव आयोग (Election Commission) के नियमों के मुताबिक, NCPI एक पंजीकृत मगर गैर-मान्यता प्राप्त दल है, इसलिए इसके पास कोई स्थायी या आरक्षित चुनाव चिह्न नहीं है।
नोट: साल 2023 के त्रिपुरा चुनावों के दौरान निर्वाचन आयोग ने इस पार्टी को 'सात किरणों (स्ट्रोक) वाली इंक पेन की निब' चुनाव चिह्न आवंटित किया था, जो अब इसकी पहचान बन चुका है।
दलबदल कानून से कैसे बचेंगे बागी? लोकसभा स्पीकर से मुलाकात
TMC की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में इन 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की है। सांसदों ने संसद में अपने लिए अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है।
कानूनी पेच और दावा: > बागी गुट का दावा है कि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं। दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए किसी भी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों का अलग होना जरूरी होता है। 28 सांसदों में से 20 का आंकड़ा दो-तिहाई से अधिक (लगभग 71%) बैठता है। ऐसे में इन सांसदों पर दलबदल कानून के तहत सदस्यता जाने का खतरा नहीं रहेगा।
संसद के आगामी सत्र में अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि यह नया गुट एनडीए के भीतर और देश की राजनीति में क्या नया रंग दिखाता है।
