राजधानी भोपाल में नगर निगम की पेयजल आपूर्ति व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। हाल ही में कराई गई पानी की गुणवत्ता जांच में बड़े तालाब से सप्लाई होने वाले अधिकांश नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, बड़े तालाब से जुड़े करीब 90 प्रतिशत सैंपलों में गंभीर गड़बड़ियां मिलीं, जबकि कोलार जल स्रोत के कुछ नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी दर्ज की गई। यह बैक्टीरिया आमतौर पर सीवेज या मल से जल के दूषित होने का संकेत माना जाता है।
जांच यूका कारखाना क्षेत्र और आसपास की बस्तियों में की गई। कुल 63 पानी के नमूनों की जांच के दौरान 43 सैंपलों में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाया गया। परीक्षण तारा एक्वाचेक H2S वायल टेस्ट के माध्यम से किया गया। जांच के लिए 30 बस्तियों से पानी के नमूने लिए गए थे, जिनमें से 19 बस्तियों का पानी दूषित मिला। गैस पीड़ितों से जुड़े संगठनों ने इसे गंभीर स्वास्थ्य संकट बताते हुए जलजनित बीमारियों के बढ़ते खतरे की आशंका जताई है।
तीन जल स्रोतों की जांच में सामने आए अलग-अलग परिणाम
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित इलाकों में बड़ा तालाब, कोलार और नर्मदा तीन अलग-अलग स्रोतों से पेयजल आपूर्ति की जाती है। बड़े तालाब से लिए गए 42 नमूनों में 38 दूषित पाए गए। वहीं कोलार जल स्रोत से लिए गए 16 नमूनों में 4 नमूने खराब निकले। राहत की बात यह रही कि नर्मदा जल परियोजना से लिए गए सभी चार नमूने पूरी तरह सुरक्षित पाए गए। भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा ने कहा कि दूषित पानी की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। उनका कहना है कि नगर निगम ने वर्ष 2018 में सीवेज और पेयजल व्यवस्था सुधारने का हलफनामा दिया था, लेकिन वर्षों बाद भी हालात में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है।जलजनित बीमारियों का बढ़ा खतरा
सामाजिक संगठनों का कहना है कि दूषित पानी के कारण टायफाइड, उल्टी-दस्त, पीलिया और पेट संबंधी संक्रमण जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। उनका आरोप है कि सरकार के पास इन बीमारियों से जुड़े मामलों का अद्यतन रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है। गैस प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाली करीब एक लाख आबादी इस समस्या से प्रभावित हो सकती है।