Raipur CCTV cameras: 8 करोड़ के बकाए में बंद पड़े 100 से ज्यादा कैमरे, भगवान भरोसे राजधानी की सुरक्षा
Raipur CCTV cameras: रायपुर में ITMS के 100 से ज्यादा कैमरे खराब पड़े हैं, जबकि कई चालू कैमरों की फुटेज धूल के कारण धुंधली हो गई है। L-T का करीब ₹8 करोड़ भुगतान अटकने से 372 CCTV और 36 ANPR कैमरों का मेंटेनेंस प्रभावित है। इससे लूट, चोरी और हिट एंड रन जैसे मामलों की जांच में पुलिस को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
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कीर्तिमान न्यूज
31 Aug 2026, 09:32 AM
रायपुर
Raipur CCTV cameras: राजधानी में अपराधियों पर नकेल कसने और हादसों के बाद उनका सुराग लगाने के लिए बिछाया गया कैमरों का जाल खुद पुलिस के लिए गले की फांस बन चुका है। शहर के चौराहे हों या आउटर के रास्ते, इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (आईटीएमएस) के 100 से ज्यादा कैमरे धूल खा रहे हैं। जो चल भी रहे हैं, उनकी तस्वीरें इतनी धुंधली हैं कि संदिग्धों का चेहरा पहचाना तो दूर, गाड़ियों के नंबर पढ़ना भी मुमकिन नहीं हो पा रहा।
स्क्रीन्स पर मिलती है ब्लैकआउट या लेंस पर धूल
नतीजा यह है कि लूट, चोरी, छिनैती और हिट एंड रन जैसे संगीन मामलों की जांच में पुलिस के हाथ खाली रह जा रहे हैं। जब भी कोई बड़ी वारदात होती है और पुलिस इंटीग्रेटेड सिटी कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (आईसीसीसी) का रुख करती है, तो वहां स्क्रीन्स पर या तो ब्लैकआउट मिलता है या फिर लेंस पर जमी धूल की वजह से धुंधले साए। चौराहे पर लगे सिग्नलों का भी मेंटेनेंस न होने से व्यवस्था चरमरा गई है। इस पूरी अव्यवस्था की जड़ में कंपनी का अटका हुआ भुगतान है।
कैमरों की सर्विसिंग पड़ी ठप
आईटीएमएस का संचालन और रखरखाव देखने वाली एलएंडटी (L&T) कंपनी का करीब 8 करोड़ रुपये का बकाया अटका हुआ है। फंड न मिलने के चलते कंपनी ने मेंटेनेंस का काम पूरी तरह रोक दिया है। कंपनी के हाथ खींचने से शहर के 372 सामान्य सीसीटीवी कैमरों और गाड़ियों के नंबर पढ़ने वाले 36 ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन (ANPR) कैमरों की सर्विसिंग ठप पड़ी है। जो कैमरे चालू भी हैं, उनके लेंस लंबे समय से साफ न होने के कारण फुटेज किसी काम के नहीं बचे हैं।
बंद पड़े 100 से ज्यादा कैमरेजांच के मोर्चे पर पुलिस के सामने खड़ी 4 बड़ी चुनौतियां
गाड़ियों के नंबर ट्रेस करना नामुमकिन: वारदात में इस्तेमाल बिना नंबर या फर्जी नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को पकड़ने वाले 36 एएनपीआर कैमरे बंद हैं। इससे बदमाशों का सुराग लगाना बेहद मुश्किल हो गया है।
भागने का डिजिटल रूट गायब: लूट या डकैती के बाद अपराधी किस चौराहे से होते हुए शहर से बाहर भागे, इसका कोई डिजिटल सबूत पुलिस को नहीं मिल पा रहा।
जांच में लग रहा ज्यादा वक्त: सरकारी व्यवस्था ठप होने से पुलिस को दुकानों और मकानों के कैमरों के भरोसे रहना पड़ रहा है। मुखबिर तंत्र खंगालने में काफी वक्त बर्बाद हो रहा है।
अटक रही हिट एंड रन की फाइलें: सड़क हादसों में टक्कर मारकर भागने वाली गाड़ियों और चालकों की पहचान न होने से पीड़ितां को न्याय नहीं मिल पा रहा।
अब कारोबारियों के भरोसे सुरक्षा, पुलिस मांग रही मदद
आईटीएमएस के नाकाम होने के बाद पुलिस ने अब अपनी रणनीति बदली है। पुलिस की टीमें दुकानों, मकानों और व्यावसायिक संस्थानों में लगे निजी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने को मजबूर हैं। शहर के ऐसे रास्तों और मोड़ों पर, जहां से अपराधियों के भागने की गुंजाइश ज्यादा रहती है, पुलिस व्यापारियों से अपने खर्चे पर बाहर की तरफ मुंह करके कैमरे लगाने की अपील कर रही है। हालांकि, इन निजी कैमरों की क्वालिटी और कवरेज एरिया सीमित होने की वजह से हर बार पुख्ता सबूत नहीं मिल पाते।
क्या कहती है पुलिस? "कैमरों और सिग्नलों के रखरखाव का जिम्मा संभालने वाली कंपनी का भुगतान बकाया है। इसके लिए शासन स्तर पर पत्राचार किया जा चुका है। जैसे ही राशि जारी होगी, कैमरों और सिग्नलों को दुरुस्त कराने का काम तेजी से शुरू कर दिया जाएगा।" — डॉ. अर्चना झा, डीसीपी (ट्रैफिक), रायपुर