सरगुजा जिले में निजी स्कूलों द्वारा निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। जिला शिक्षा विभाग ने नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होने के बाद कुछ निजी स्कूलों पर जुर्माना तो लगाया, लेकिन करीब तीन महीने बीत जाने के बाद भी उसकी वसूली नहीं हो सकी।
इसे लेकर अभिभावकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है और विभाग की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि जब शिक्षा विभाग ने जांच के बाद स्कूलों को दोषी मानते हुए आर्थिक दंड लगाया था, तो अब तक उससे जुड़ी कार्रवाई पूरी क्यों नहीं हुई। उनका आरोप है कि जुर्माना वसूल नहीं होने से संबंधित स्कूलों को अप्रत्यक्ष रूप से राहत मिल गई है और इससे विभाग की सख्ती पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
एनसीईआरटी किताबों से बढ़ा अभिभावकों का खर्च
मामले का दूसरा पहलू यह भी है कि विभाग के निर्देशों के बाद अब कई अभिभावक अपने बच्चों के लिए एनसीईआरटी की किताबें खरीद रहे हैं। वहीं, पहले निजी प्रकाशकों की जो किताबें उन्होंने स्कूलों के कहने पर खरीदी थीं, उन्हें वापस नहीं लिया जा रहा है। इससे कई परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ गया है। अभिभावकों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन निजी स्कूलों को पहले खरीदी गई किताबें वापस लेने के निर्देश देता, तो उन्हें दोबारा किताबें खरीदने की नौबत नहीं आती।अप्रैल में हुई थी जांच और बैठक
बताया जाता है कि अप्रैल में जिला प्रशासन और जिला शिक्षा अधिकारी की टीम ने अलग-अलग निजी स्कूलों में अभिभावकों के साथ बैठक कर शिकायतों की जांच की थी। जांच के दौरान निजी प्रकाशकों की किताबों को लेकर नियमों के उल्लंघन की बातें सामने आई थीं। इसके बाद ओरिएंटल पब्लिक स्कूल, कार्मेल स्कूल, बिरला ओपन माइंड स्कूल और मॉन फोर्ट स्कूल सहित कुछ संस्थानों पर जुर्माना लगाया गया था। उस समय विभाग की कार्रवाई की काफी सराहना भी हुई थी।
जिला शिक्षा अधिकारी दिनेश झा ने इस मामले में सरकारी प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित स्कूलों में गठित अभिभावक समिति ने लिखित रूप से यह बताया है कि निजी प्रकाशकों की किताबों को लेकर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। इसी आधार पर आगे की कार्रवाई नहीं की जा रही है। हालांकि, कई अभिभावकों का दावा है कि ऐसी समितियों में सीमित संख्या में ही लोगों को शामिल किया जाता है और उनकी राय पूरे अभिभावक वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करती। उनका कहना है कि इस व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते रहे हैं।