यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था में फ्रांस की भूमिका लगातार मजबूत होती नजर आ रही है। नॉर्वे ने फ्रांस की ‘फॉरवर्ड डिटरेंस’ पहल में शामिल होने की घोषणा की है। इसके साथ ही वह उन यूरोपीय देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो महाद्वीप की सुरक्षा में फ्रांस की परमाणु क्षमता की संभावित भूमिका पर चर्चा कर रहे हैं। नॉर्वे सरकार ने बुधवार को कहा कि वह फ्रांस के साथ सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने और यूरोप की सामूहिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत में हिस्सा लेगा। इस कदम को यूरोप में बदलते सुरक्षा समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
फ्रांस की पहल को मिला समर्थन
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हाल के वर्षों में यूरोप की सामरिक स्वायत्तता को मजबूत करने पर जोर दिया है। इसी सोच के तहत उन्होंने यूरोपीय देशों को फ्रांस की सुरक्षा और परमाणु प्रतिरोधक क्षमता पर आधारित सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था। अब तक जर्मनी, पोलैंड, नीदरलैंड्स, बेल्जियम, डेनमार्क, स्वीडन, ग्रीस, यूनाइटेड किंगडम और अब नॉर्वे इस पहल से जुड़ चुके हैं। इससे यूरोपीय सुरक्षा ढांचे में फ्रांस की भूमिका को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
यूरोप में दो परमाणु शक्तियां
यूरोप में फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम ही ऐसे देश हैं जिनके पास स्वतंत्र परमाणु हथियार क्षमता है। ब्रिटेन की परमाणु प्रणाली कई मामलों में अमेरिका के साथ गहरे सहयोग और तकनीकी ढांचे से जुड़ी हुई है।वहीं फ्रांस अपनी स्वतंत्र परमाणु नीति और सैन्य रणनीति के लिए जाना जाता है। इसी वजह से यूरोपीय देशों के बीच फ्रांस की सुरक्षा भूमिका को लेकर रुचि बढ़ती दिखाई दे रही है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदले हालात
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में सुरक्षा चिंताएं लगातार बढ़ी हैं। कई यूरोपीय देश अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने और दीर्घकालिक सुरक्षा विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। फ्रांस की पहल को इसी व्यापक सुरक्षा रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। यूरोपीय देश यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि भविष्य में महाद्वीप की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत कैसे बनाया जाए।
नाटो देश
फ्रांस की इस पहल को लेकर चर्चाएं तेज हैं, लेकिन अधिकांश यूरोपीय देशों ने स्पष्ट किया है कि नाटो उनकी सामूहिक सुरक्षा का मुख्य आधार बना रहेगा। फ्रांस की पहल को नाटो के विकल्प के बजाय यूरोपीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक अतिरिक्त प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। नॉर्वे के शामिल होने के बाद यह साफ संकेत मिला है कि यूरोप के कई देश सुरक्षा और रक्षा सहयोग के नए विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। आने वाले समय में फ्रांस की भूमिका और यूरोपीय देशों के साथ उसके रक्षा संबंध अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण विषय बने रह सकते हैं।
