भारतीय दर्शन में विविधता और सुरक्षा का भाव
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक साझा विरासत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आप चाहें मंदिरों में जाएं, मठों में दर्शन करें या गुरुद्वारों में शीश नवाएं, हर जगह एक ही तरह का ज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिलता है।
"भारतीय विचारधारा का मूल आधार यह है कि हम हर तरह की विविधता का न केवल सम्मान करें और उसे स्वीकार करें, बल्कि सभी को सुरक्षा भी प्रदान करें। पीढ़ियों से यही हमारा मूल स्वभाव रहा है। जो बातें बदलने योग्य हैं, उन्हें समय के साथ बदल जाना चाहिए, लेकिन शाश्वत सत्यों पर हमेशा अडिग रहना चाहिए।"
इसी संदर्भ में उन्होंने कैप्टन स्मित मछार का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके द्वारा किया गया कार्य वास्तव में भारतीय और हिंदू स्वभाव की सहज अभिव्यक्ति है।
'स्वबोध' से ही मजबूत होगा भारत
संघ की 100 वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस का मुख्य कार्य समाज में ‘स्व’ (आत्मबोध) की भावना को जगाना रहा है। इसी ‘स्व’ की नींव पर भारत को एकजुट, अखंड और शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
संविधान में ‘स्व’ का दर्शन: संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि इस 'स्वबोध' की स्पष्ट झलक हमारे संविधान की प्रस्तावना के शुरुआती शब्दों—‘हम, भारत के लोग’—में मिलती है।
सभ्यता का भावनात्मक आधार: यही 'हम' की भावना देश का वह भावनात्मक जोड़ है, जिसने तमाम विविधताओं के बावजूद भारत को प्राचीन काल से एक राष्ट्र और एक समाज के रूप में बांधकर रखा है।
इतिहास की सीख: जब भी हम अपनी इस मूल भावना को भूले, देश का पतन हुआ, हम आपस में बंटे, कमजोर हुए और इसी वजह से हमें सदियों तक गुलामी का दंश झेलना पड़ा।






