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आरोपी गिरफ्तार
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बिलासपुर

सर्पदंश मुआवजा घोटाला : 431 केस, ₹17 करोड़ से ज्यादा की राशि और 17 गिरफ्तार

बिलासपुर के फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले में अब तक 17 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। जांच में डॉक्टर, पुलिसकर्मी और तहसील कर्मचारियों समेत कई लोगों की भूमिका सामने आई है। आरोप है कि सामान्य मौतों को सर्पदंश बताकर फर्जी दस्तावेजों के जरिए 431 मामलों में करीब 17.24 करोड़ रुपए का मुआवजा लिया गया। पुलिस अब पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
21 Jul 2026, 02:55 PM
बिलासपुर
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच लगातार आगे बढ़ रही है। मामले में अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी, होमगार्ड जवान और तहसील कर्मचारियों समेत 17 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। 
पुलिस जांच में सामने आया है कि सरकारी मुआवजा राशि हासिल करने के लिए एक संगठित गिरोह काम कर रहा था, जो सामान्य मौतों को सर्पदंश बताकर फर्जी दस्तावेज तैयार करता था। जांच में कथित रूप से सामने आए नेटवर्क में स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और राजस्व विभाग से जुड़े लोगों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है। पुलिस का कहना है कि मामले में जो भी लोग शामिल पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

सामान्य मौतों को सर्पदंश बताकर लिया करोड़ों का मुआवजा

सरकारी नियमों के अनुसार सर्पदंश से मौत होने पर पीड़ित परिवार को 4 लाख रुपए की सहायता राशि दी जाती है। इसी प्रावधान का फायदा उठाकर गिरोह ने सामान्य मौतों को सांप काटने से हुई मौत बताकर मुआवजा हासिल किया। जांच के मुताबिक, बिलासपुर में ऐसे 431 मामलों में करीब 17 करोड़ 24 लाख रुपए का भुगतान किया गया। आरोप है कि इन मामलों में फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, पटवारी रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। कई परिवारों को भी इस फर्जीवाड़े की पूरी जानकारी नहीं होने की बात सामने आई है। पुलिस जांच में पता चला है कि सिम्स में मौत की जानकारी मिलने के बाद गिरोह के सदस्य सक्रिय हो जाते थे। इसके बाद वे मृतक के परिजनों से संपर्क कर उन्हें मुआवजा दिलाने का भरोसा देते थे। आरोप है कि परिजनों को आर्थिक लालच देकर मौत का कारण सर्पदंश बताने के लिए तैयार किया जाता था। इसके बाद फर्जी दस्तावेजों के जरिए मुआवजे की प्रक्रिया पूरी कराई जाती थी। पुलिस के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क में अधिवक्ता हीरा खांडेकर और उसके सहयोगियों की भूमिका सामने आई है। जांच में इसी नेटवर्क को "एडवोकेट डायमंड गैंग" नाम दिया गया है।

तहसील से लेकर अस्पताल तक फैला था नेटवर्क

जांच में सामने आया है कि तहसील स्तर पर भी कुछ कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। आरोप है कि दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा पैसे लेकर प्रकरणों को आगे बढ़ाने और प्रक्रिया पूरी कराने में मदद करता था। फर्जी पीएम रिपोर्ट, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेजों के आधार पर मुआवजा प्रकरण तैयार किए जाते थे। इसके बाद तहसील और एसडीएम कार्यालय में मौजूद सिस्टम के जरिए इन्हें आगे बढ़ाया जाता था। पुलिस जांच में कुछ पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी सवालों के घेरे में आई हैं। आरोप है कि मौत का कारण बदलने के लिए रिपोर्ट में हेरफेर की गई। कुछ डॉक्टरों के नाम भी जांच में सामने आए हैं। पुलिस ने कई ठिकानों पर दबिश दी है। वहीं, कुछ डॉक्टरों के फरार होने की जानकारी भी सामने आई है। 

सर्पदंश मुआवजा मामला में आरोपी गिरफ्तार
14 से ज्यादा ठिकानों पर पुलिस की कार्रवाई

सिम्स के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति ने बताया कि डॉ. एसएन बोले की छुट्टी खत्म हो चुकी है, लेकिन वे ड्यूटी पर वापस नहीं लौटे हैं। सर्पदंश मुआवजा मामले में पुलिस अब तक 14 से ज्यादा स्थानों पर छापेमारी कर चुकी है। जांच के दायरे में तत्कालीन सिम्स चौकी प्रभारी, पुलिसकर्मी, होमगार्ड जवान, डॉक्टर, अधिवक्ता और तहसील कर्मचारी शामिल हैं। पुलिस का कहना है कि दस्तावेजों की जांच के दौरान कई मामलों में गड़बड़ियां मिली हैं। कोनी थाना क्षेत्र में दर्ज मामलों में भी फर्जी दस्तावेज मिलने की बात सामने आई है। जांच में कुछ मामलों में फर्जी हस्ताक्षर के जरिए मौत का कारण बदलने का आरोप भी सामने आया है। एक मामले में हार्ट अटैक से हुई मौत को सर्पदंश बताकर मुआवजा लेने की बात कही जा रही है। पुलिस अब सभी संबंधित मामलों की जांच कर रही है और अन्य संदिग्धों की भूमिका भी खंगाली जा रही है। 

एसएसपी बोले- दोषियों को नहीं बख्शेंगे

बिलासपुर एसएसपी ने कहा कि मामले में शामिल किसी भी व्यक्ति को छोड़ा नहीं जाएगा। उन्होंने बताया कि अब तक मुख्य आरोपी अधिवक्ता, उसके रिश्तेदार, बैंक कर्मचारी, डॉक्टर और तहसील कर्मचारियों समेत कई लोगों पर कार्रवाई की जा चुकी है। तहसील कर्मचारियों की गिरफ्तारी के बाद कर्मचारी संगठनों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। लिपिक वर्गीय कर्मचारी संघ ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि केवल छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। संघ का आरोप है कि करोड़ों रुपए के इस मामले में बड़े अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। संगठन ने कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की है।

2025 में सामने आया था पहला मामला

फर्जी सर्पदंश मुआवजा मामले का पहला मामला वर्ष 2025 में बिल्हा थाना क्षेत्र से सामने आया था। उस समय जहर खाने से हुई मौत को सर्पदंश बताकर फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार करने का आरोप लगा था। इसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की और धीरे-धीरे कई अन्य मामलों का खुलासा हुआ। फिलहाल पुलिस पूरे नेटवर्क की जांच में जुटी है और आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है।
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