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सरकारी लैब में जांच मशीन
सरकारी लैब में जांच मशीन
रायपुर

स्वास्थ्य विभाग विवादों में : सरकारी लैब बंद होने से पहले 10 करोड़ की खरीद पर उठे सवाल

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में 440 करोड़ रुपये के मोक्षित रीजेंट स्कैम के बाद अब 10 करोड़ रुपये की नई रीजेंट खरीदी विवादों में है। सरकारी पैथोलॉजी लैब बंद कर निजी एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपे जाने के बावजूद की गई इस खरीद पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि विशेषज्ञों के अनुसार यह रीजेंट नई मशीनों में उपयोग नहीं हो सकेगा और करोड़ों रुपये का स्टॉक बेकार होने की आशंका है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 25 Jun 2026, 11:58 AM · अपडेट: 30 Oct 2026, 11:27 PM
रायपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में बहुचर्चित 440 करोड़ रुपये के मोक्षित रीजेंट घोटाले के बाद अब रीजेंट की नई खरीद को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी अस्पतालों की पैथोलॉजी सेवाएं चरणबद्ध तरीके से निजी एजेंसी को सौंपे जाने के बीच करीब 10 करोड़ रुपये के नए रीजेंट खरीदे जाने को लेकर विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग ने जून महीने से सरकारी अस्पतालों की पैथोलॉजी लैब का संचालन निजी एजेंसी के माध्यम से शुरू कर दिया है। इसी दौरान पुरानी मशीनों को चालू करने और उनकी टेस्टिंग के नाम पर बड़ी मात्रा में नए रीजेंट की खरीद की गई। आलोचकों का कहना है कि जब सरकारी लैब बंद होने की प्रक्रिया में हैं, तब इतनी बड़ी खरीद का औचित्य स्पष्ट नहीं है।

सरकारी लैब बंद होने की तैयारी, फिर भी खरीदे गए रीजेंट

बताया जा रहा है कि 23 जून तक राज्य के चार जिला अस्पतालों में संचालित "हमर लैब" को बंद कर मशीनों को स्टोर में रख दिया गया है। अगले कुछ महीनों में जिला अस्पतालों के साथ-साथ प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की सरकारी पैथोलॉजी लैब भी चरणबद्ध तरीके से बंद की जानी हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि जिन मशीनों का उपयोग जल्द समाप्त होने वाला है, उनके लिए करोड़ों रुपये के रीजेंट क्यों खरीदे गए। विशेषज्ञों के मुताबिक हर पैथोलॉजी मशीन के लिए अलग प्रकार का रीजेंट इस्तेमाल होता है और एक मशीन का केमिकल दूसरी मशीन में उपयोग नहीं किया जा सकता। यदि नई एजेंसी अपनी मशीनें स्थापित कर रही है तो पुराने सिस्टम के लिए खरीदा गया रीजेंट उपयोग में नहीं आ पाएगा।

फिर बेकार हो सकता है करोड़ों रुपये का स्टॉक

इस पूरे मामले को लेकर आशंका जताई जा रही है कि खरीदा गया रीजेंट सरकारी लैब में उपयोग होने से पहले ही अनुपयोगी रह जाएगा और समय सीमा पूरी होने के बाद इसे नष्ट करना पड़ सकता है। इससे सरकारी धन की बर्बादी की आशंका व्यक्त की जा रही है। हालांकि इस संबंध में छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (CGMSC) और स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है। रीजेंट खरीदी को लेकर इससे पहले भी बड़ा विवाद सामने आ चुका है। 

पिछली सरकार के कार्यकाल में मोक्षित कॉर्पोरेशन से बड़ी मात्रा में रीजेंट की अग्रिम खरीद की गई थी। आरोप था कि जरूरत से कहीं अधिक मात्रा में खरीद होने के कारण करोड़ों रुपये का रीजेंट समय पर उपयोग नहीं हो सका और एक्सपायरी के बाद खराब हो गया।

कैबिनेट के फैसले के बाद भी जारी हुआ खरीद आदेश

मामले में एक और सवाल खरीद प्रक्रिया के समय को लेकर उठ रहा है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 21 जनवरी को राज्य मंत्रिमंडल ने प्रदेश की पैथोलॉजी सेवाएं एचएलएल को सौंपने का निर्णय ले लिया था। इसके बावजूद दो दिन बाद 23 जनवरी को वैनगार्ड डायग्नोस्टिक्स को रीजेंट और ब्लड यूरिया किट की आपूर्ति का खरीद आदेश जारी कर दिया गया।

घटनाक्रम इस प्रकार बताया जा रहा है—

  • 5 जनवरी: वैनगार्ड डायग्नोस्टिक्स के साथ पुरानी मशीनों की मरम्मत और अनलॉक करने का अनुबंध।
  • 21 जनवरी: कैबिनेट ने पैथोलॉजी सेवाएं एचएलएल को सौंपने का निर्णय लिया।
  • 23 जनवरी: वैनगार्ड को रीजेंट और किट सप्लाई का परचेज ऑर्डर जारी।
  • 28 जनवरी: पुरानी मशीनों को अनलॉक करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
  • 29 जनवरी: एचएलएल को अगले पांच वर्षों के लिए आधिकारिक रूप से कार्य सौंपने का आदेश जारी किया गया।

एचएलएल के तीन मॉडल में चुना गया सबसे महंगा विकल्प

सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार एचएलएल ने सरकार को तीन अलग-अलग मॉडल का प्रस्ताव दिया था।

मॉडल-1 में अधिकांश सरकारी स्टाफ के उपयोग के साथ मरीजों को जांच दरों पर 20 प्रतिशत तक छूट देने का प्रस्ताव था।

मॉडल-2 में सीमित सरकारी स्टाफ के साथ 7 प्रतिशत छूट का विकल्प रखा गया था।

मॉडल-3 में पूरी व्यवस्था एचएलएल के माध्यम से संचालित करने और मरीजों को किसी भी प्रकार की छूट नहीं देने का प्रस्ताव शामिल था।

सरकार ने तीसरे मॉडल को मंजूरी दी। हालांकि आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि वर्तमान में कई स्थानों पर सरकारी भवन और उपलब्ध स्टाफ का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन मरीजों को जांच शुल्क में कोई रियायत नहीं मिल रही है।

अगले छह महीनों में पूरी तरह बदलेगी लैब व्यवस्था

स्वास्थ्य विभाग की योजना के अनुसार राज्य के सभी जिला अस्पतालों की सरकारी पैथोलॉजी लैब चरणबद्ध तरीके से बंद की जा रही हैं। इसके बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की लैब भी अगले छह महीनों के भीतर निजी व्यवस्था में स्थानांतरित कर दी जाएंगी। ऐसे में मौजूदा रीजेंट खरीद को लेकर उठे सवाल आने वाले दिनों में और चर्चा का विषय बन सकते हैं।
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