भिलाई स्थित जेपी सीमेंट प्लांट में काम करने वाले करीब 130 कर्मचारी पिछले 27 से 28 महीनों से वेतन का इंतजार कर रहे हैं। आर्थिक संकट के बावजूद कर्मचारी आज भी रोजाना प्लांट पहुंच रहे हैं। सुबह और शाम अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद वे दूसरे कामों में जुट जाते हैं।
कर्मचारियों को उम्मीद है कि कंपनी की दिवालिया प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनका वर्षों से लंबित वेतन और अन्य भुगतान मिल सकेगा। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें अब भी भरोसा है कि कंपनी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनका बकाया एक साथ मिलेगा। इसी उम्मीद के चलते उन्होंने नौकरी छोड़ने के बजाय प्लांट आना जारी रखा है।
दिवालिया प्रक्रिया से बदली स्थिति
दरअसल, जेपी सीमेंट कंपनी को 18 अक्टूबर 2025 को दिवालिया घोषित किया गया था। इसके बाद कंपनी में कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) लागू कर दी गई। अब कंपनी के संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) आशुतोष खेमानी के पास है। दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने के बाद कंपनी का पुराना बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स भंग हो चुका है। पुराने अधिकारियों के पास अब किसी भी तरह का प्रशासनिक या वित्तीय निर्णय लेने का अधिकार नहीं बचा है। जेपी सीमेंट प्लांट के पूर्व वाइस प्रेसिडेंट और वर्तमान यूनिट हेड पीके सिंह ने बताया कि 18 अक्टूबर 2025 के बाद से कंपनी से जुड़े किसी भी बड़े फैसले का अधिकार उनके पास नहीं है। उन्होंने कहा कि अब पूरी जिम्मेदारी आईआरपी के पास है और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स भी समाप्त हो चुका है।कर्ज लेकर परिवार चला रहे कर्मचारी
उन्होंने बताया कि कर्मचारियों को न तो नौकरी से हटाने का आदेश दिया गया और न ही उन्हें काम बंद करने के लिए कहा गया। वहीं, कंपनी की ओर से कोई नया काम भी नहीं सौंपा गया है। इसी कारण कर्मचारी रोजाना प्लांट पहुंचकर अपनी हाजिरी लगाते हैं और फिर अन्य कामों के लिए निकल जाते हैं। कर्मचारियों के मुताबिक, प्लांट में करीब 150 ऑन रोल कर्मचारी हैं। इनमें से अधिकांश कर्मचारी पिछले ढाई साल से वेतन नहीं मिलने के कारण आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं।
कई कर्मचारियों ने परिवार का खर्च चलाने के लिए बैंक से लोन लिया है तो कुछ लोग क्रेडिट कार्ड और निजी उधारी के सहारे गुजारा कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि प्रत्येक कर्मचारी का करीब 10 से 15 लाख रुपए तक वेतन और अन्य भुगतान बचा है। कर्मचारियों को हर महीने करीब 30 से 40 हजार रुपए वेतन मिलता था, लेकिन लंबे समय से भुगतान नहीं होने के कारण कई परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी है।