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इसरों ने लगाई इस्तीफे पर रोक
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इसरो : वैज्ञानिकों के इस्तीफे से हड़कंप, सरकार ने बदले नियम, अब आसानी से नहीं छोड़ सकेंगे नौकरी

भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो में इस समय बड़े बदलाव की सुगबुगाहट है। पिछले कुछ समय में कई सीनियर वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने अचानक पद छोड़ने का फैसला लिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने नौकरी से इस्तीफा दिया है।

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प्रकाशित: 16 Jul 2026, 12:24 PM · अपडेट: 05 Oct 2026, 10:59 PM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

भारत के अंतरिक्ष विभाग में इस समय एक बहुत बड़ी आंतरिक हलचल मची हुई है। देश की सबसे प्रतिष्ठित अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के कई सीनियर साइंटिस्ट और टेक्निकल एक्सपर्ट्स लगातार अपने पदों से इस्तीफा दे रहे हैं। ये सभी अनुभवी वैज्ञानिक सरकारी नौकरी छोड़कर तेजी से आगे बढ़ रहे प्राइवेट स्पेस सेक्टर्स का रुख कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार पिछले 1 साल के भीतर करीब 100 से 120 वैज्ञानिकों ने अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया है। वैज्ञानिकों के इस तरह अचानक पाला बदलने से केंद्र सरकार बेहद चौकन्नी हो गई है। यही वजह है कि सरकार ने अब इस पर पूरी तरह से लगाम लगाने के लिए एक बहुत ही सख्त कदम उठाया है। इस अभूतपूर्व प्रशासनिक बदलाव के बाद अबदेश के नीति निर्माताओं के बीच गंभीर मंथन शुरू हो गया है।

14 जुलाई को नया फरमान जारी

अंतरिक्ष विभाग ने इस संकट से निपटने के लिए 14 जुलाई को एक नया और बेहद गोपनीयफरमान जारी किया है। इस नए आदेश के तहत अब किसी भी वैज्ञानिक के इस्तीफे को स्थानीय स्तर पर सीधे मंजूरी नहीं दी जाएगी। हाल ही में नौकरी छोड़ने वाले दिग्गजों में गगनयान और चंद्रयान-3 जैसे बेहद महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियानों से जुड़े प्रोजेक्ट डायरेक्टर और मैनेजर्स भी शामिल हैं। सरकार का साफ मानना है कि बीच मिशन में इस तरह अनुभवी लोगों के काम छोड़ने से देश के बड़े और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की गति बहुत धीमी हो रही है। इसी वजह से वैज्ञानिकों के इस्तीफे और अपनी मर्जी से समय से पहले रिटायरमेंट लेने यानी वीआरएस के नियमों को तत्काल प्रभाव से कड़ा कर दिया गया है। हालांकि इसरो के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे एक सामान्य प्रशासनिक सुधार बताया है जिससे परियोजनाओं को अचानक होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखा जा सके।

ग्रुप ए के अधिकारियों के लिए अब आसान नहीं होगा नौकरी छोड़ना

नए जारी हुए मेमोरेंडम के मुताबिक हाई-प्रोफाइल स्पेस प्रोजेक्ट्स से सीधे जुड़े ग्रुप ए श्रेणी के साइंटिफिक और टेक्निकल स्टाफ के इस्तीफे या वीआरएस के आवेदनों को अब रूटीन प्रक्रिया मानकर आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा। विभाग ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि वैज्ञानिकों के अचानक जाने से देश की सुरक्षा और प्रतिष्ठा से जुड़ी बेहद खास परियोजनाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।

तमाम सेंटर्स के प्रमुखों और निर्देशकों को स्पष्ट आदेश दिया गया है कि जब तक कोई स्पेस मिशन पूरी तरह से सफल और संपन्न नहीं हो जाता, तब तक वे अपने स्तर पर किसी भी वैज्ञानिक का इस्तीफा मंजूर न करें। ऐसे हर एक मामले को उचित और ठोस कारणों के साथ अंतिम फैसले के लिए सीधे केंद्रीय मुख्यालय को भेजा जाएगा।

जानिए किस सेंटर से कितने वैज्ञानिकों ने दिया इस्तीफा

अंतरिक्ष विभाग ने आधिकारिक तौर पर नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारियों का कोई निश्चित आंकड़ा तो जारी नहीं किया है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों ने कुछ चौंकाने वाले नाम उजागर किए हैं। इस्तीफा देने वालों में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के एलवीएम-3 प्रोजेक्ट डायरेक्टर विक्टर जोसेफ, यूआर राव सैटेलाइट सेंटर के स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट प्रोजेक्ट डायरेक्टर और चंद्रयान-3 के प्रोजेक्ट मैनेजर आदित्य रल्लापल्ली जैसे बड़े नाम शामिल हैं। हालांकि यह संख्या इसरो के कुल 14,600 से अधिक कर्मचारियों की तुलना में बहुत छोटी दिखती है, लेकिन इसने एजेंसी के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों की रीढ़ को प्रभावित किया है। कुल 1,339 कर्मचारियों वाले यूआर राव सैटेलाइट सेंटर से करीब 80 लोगों ने नौकरी छोड़ी है। वहीं इसरो के सबसे बड़े केंद्र विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर, जहां 4,577 कर्मचारी कार्यरत हैं, वहां से पिछले वित्तीय वर्ष के अंत तक कम से कम 20 बड़े वैज्ञानिकों ने अपना इस्तीफा सौंप दिया है।

भारी-भरकम पैकेज और प्राइवेट कंपनियों का आकर्षण है मुख्य वजह

इस समय भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र बहुत तेजी से अपने पैर पसार रहा है। बाजार में नई-नई प्राइवेट स्पेस कंपनियां आ रही हैं जिन्हें अपना काम शुरू करने के लिए इसरो जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के अनुभवी और कुशल वैज्ञानिकों की सख्त जरूरत है। ये प्राइवेट कंपनियां इसरो के टैलेंटेड वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए बाजार दर से कहीं ज्यादा और मुंह मांगा पैसा ऑफर कर रही हैं। सरकारी नौकरी में तय वेतन और सीमित सुविधाओं की तुलना में निजी क्षेत्र का यह भारी-भरकम पैकेज और काम करने की आजादी ही मुख्य वजह है जिसके चलते इसरो के बेहतरीन वैज्ञानिक इस समय तेजी से निजी क्षेत्र की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। अब देखना होगा कि सरकार के इस नए सख्त नियम का वैज्ञानिकों के इस पलायन पर क्या असर पड़ता है।

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