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सिमडेगा का जर्जर लकड़ी पुल
सिमडेगा का जर्जर लकड़ी पुल
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विकास के वादे बह गए : खाट पर मरीज, खतरे में बचपन... फिर भी नहीं बना पाया एक पुल

सिमडेगा के बड़बेरा बेलकोना गांव में बारिश के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने से गांव का संपर्क कट जाता है। ग्रामीण जर्जर लकड़ी के पुल से नदी पार करने को मजबूर हैं, जबकि मरीजों को खाट पर और बच्चों को जान जोखिम में डालकर स्कूल जाना पड़ता है। वर्षों से पुल की मांग के बावजूद अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं हुआ।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 26 Jul 2026, 02:43 PM · अपडेट: 29 Oct 2026, 08:30 PM
सिमडेगा
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
झारखंड के सिमडेगा जिले से एक बार फिर विकास के सरकारी दावों को चिढ़ाती हुई तस्वीर सामने आई है। बानो प्रखंड के बड़बेरा बेलकोना गांव में मानसून की पहली बारिश के साथ ही ग्रामीणों की मुश्किलें चरम पर पहुंच गई हैं। गांव के बीच से बहने वाली नदी का जलस्तर बढ़ते ही पूरा इलाका बाकी दुनिया से कटकर एक टापू में तब्दील हो जाता है। ऐसे में मूलभूत सुविधाओं से महरूम ग्रामीण लकड़ियों के बने एक जर्जर और बेहद कमजोर ढांचे के सहारे उफनती नदी पार करने को मजबूर हैं। नदी पर बना लकड़ी का यह अस्थाई पुल किसी भी वक्त बड़े हादसे का कारण बन सकता है। इसके बावजूद ग्रामीणों के पास इसे पार करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

जान जोखिम में डाल नदी पार कराते
खाट पर सांसें, जान हथेली पर रखकर स्कूल जाते बच्चे

  • आपातकाल में खाट ही सहारा: सबसे बदतर हालत स्वास्थ्य सेवाओं की है। अगर गांव में कोई अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए, तो एम्बुलेंस या गाड़ी गांव तक नहीं पहुंच सकती। परिजन मरीज को खाट (चारपाई) पर लादकर, अपनी जान जोखिम में डालते हुए नदी पार कराते हैं, तब जाकर कहीं अस्पताल पहुंच पाते हैं।
  • नौनिहालों की पढ़ाई पर पहरा: रोज सुबह स्कूल जाने वाले मासूम बच्चे हथेली पर जान रखकर इस खतरनाक पुल से गुजरते हैं। जरा सी चूक किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती है, जिससे परिजनों के दिल में हर पल डर बना रहता है।

नेताओं के चक्कर काटे, प्रशासन से गुहार लगाई...

यह कोई एक-दो दिन की बात नहीं है, बल्कि हर साल बारिश के मौसम में यही कहानी दोहराई जाती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने पुल बनवाने के लिए नेताओं से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक के खूब चक्कर काटे।
"आवेदनों और मुलाकातों का सिलसिला सालों से चल रहा है, लेकिन हर बार सिर्फ मीठे दिलासे और कोरे वादे ही हाथ लगे। कागजों में सिमटा विकास आज तक हमारी नदी पार नहीं कर पाया।" — स्थानीय ग्रामीण

बुनियादी जरूरत के लिए तरस रहे ग्रामीण

शासन-प्रशासन की इस बेरुखी और अनदेखी के चलते आज भी बेलकोना गांव के लोग एक पक्के पुल जैसी बुनियादी जरूरत के लिए तरस रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है या इन ग्रामीणों की सुध समय रहते ली जाएगी?
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