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सयानी घोष घिरीं :  हनुमान चालीसा से कलमा  बयान पर सोशल मीडिया में तीखी बहस
सयानी घोष घिरीं :  हनुमान चालीसा से कलमा  बयान पर सोशल मीडिया में तीखी बहस
चुनाव

सयानी घोष घिरीं :  हनुमान चालीसा से कलमा  बयान पर सोशल मीडिया में तीखी बहस

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 के रुझानों में भाजपा की बढ़त के बीच टीएमसी सांसद सयानी घोष के पुराने भाषण फिर चर्चा में हैं। मंच से कलमा और हनुमान चालीसा पढ़ने को लेकर अब सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल किया जा रहा है, जिससे धर्मनिरपेक्षता बनाम राजनीति की बहस तेज हो गई है।

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 04 May 2026, 03:55 PM · अपडेट: 27 Oct 2026, 09:27 PM
कोलकाता
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के रुझानों ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत की ओर बढ़ता दिखाया जा रहा है, वहीं लंबे समय से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम चुनौतीपूर्ण नजर आ रहे हैं। इसी बीच टीएमसी सांसद सयानी घोष एक बार फिर सोशल मीडिया की बहस के केंद्र में आ गई हैं।

दरअसल, चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए उनके कुछ भाषण अब फिर वायरल हो रहे हैं। एक मंच से उन्होंने जहां कलमा पढ़ा, वहीं हनुमान चालीसा का पाठ भी किया था। उस समय इसे कई लोगों ने “धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक” बताया था, लेकिन अब चुनावी रुझानों के बदलते माहौल में यही बयान उनके लिए सवाल बन गए हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X  पर कई यूजर्स उनके इस अंदाज पर कटाक्ष कर रहे हैं। कुछ यूजर्स का कहना है कि यह “राजनीतिक सुविधा के अनुसार धार्मिक रंग बदलने” जैसा है, जबकि अन्य इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं।

इस विवाद में एक और पहलू जुड़ता है योगी आदित्यनाथ की बंगाल में हुई चुनावी रैलियों से। उस दौरान टीएमसी की ओर से सयानी घोष को भाजपा के फायरब्रांड प्रचार का जवाब माना जा रहा था। अब यूजर्स यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या मंच पर अलग-अलग धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग केवल राजनीतिक संदेश देने का माध्यम था?

सयानी घोष अपने भाषणों के अनोखे अंदाज के लिए जानी जाती हैं। संसद में भी उन्होंने कई बार शायरी और प्रतीकों के जरिए अपनी बात रखी है। एक बार उन्होंने कहा था कि “संविधान हमारी भगवद्गीता है और गणतंत्र हमारी पूजा।” वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि “हम संविधान के साथ लड़ते हैं, हाथ में तलवार नहीं रखते।”

हालांकि, मौजूदा राजनीतिक माहौल में उनके इन्हीं बयानों को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। यह विवाद एक बार फिर उस बहस को हवा दे रहा है कि क्या राजनीति में धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल वास्तव में धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करता है, या फिर यह केवल चुनावी रणनीति भर है।

 

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