"आदिवासी संस्कृति" के लिए 27 परिणाम मिले
छत्तीसगढ़
बस्तर की नई वैश्विक पहचान : जंगल के छिंद बीजों से तैयार हुई कैफीन-फ्री हर्बल कॉफी, कचरे से कंचन की अनोखी मिसाल
दंतेवाड़ा के युवा उद्यमी विशाल हालदार ने बस्तर के जंगलों में बेकार माने जाने वाले छिंद (खजूर प्रजाति) के बीजों से कैफीन-फ्री हर्बल कॉफी विकसित कर अनोखा नवाचार किया है। यह कॉफी एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर और स्वास्थ्यवर्धक है, जो अनिद्रा, हाई ब्लड प्रेशर और एसिडिटी के मरीजों के लिए उपयोगी मानी जा रही है। इस नवाचार को इनोवेशन महाकुंभ में प्रथम स्थान मिला है और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने भी इसे सराहा है। यह प्रोजेक्ट न केवल पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण है, बल्कि बस्तर में ग्रामीण रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई संभावनाएं भी खोल रहा है।
महासमुंद
विकास या विनाश : सड़क बनाने बागबाहरा के द्वारतराकला में रातों रात जड़ से उखाड़ फेंके सैकड़ों फलदार पेड़
आदिवासी आजीविका पर गहरा संकट : सड़कें आवाजाही के लिए होती हैं, उजाड़ने के लिए नहीं। बागबाहरा के द्वारतराकला में विकास के नाम पर जो हुआ, वह पेड़ों की कटाई नहीं, आदिवासी संस्कृति और उनकी आजीविका की हत्या है। जिन पेड़ों को पीढ़ियों ने सींचा, उन्हें सरकारी मशीनों ने चंद घंटों में मिट्टी में मिला दिया।
छत्तीसगढ़
बस्तर के लिए खुलेगा वैश्विक द्वार : 4 घंटे में समुद्र तक, बदलेगी विकास की तस्वीर
रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर (NH-130 CD) बस्तर के लिए विकास की नई राह खोलने जा रहा है। इस 6-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर से जगदलपुर से विशाखापट्टनम की दूरी घटकर मात्र 3.5 से 4 घंटे रह जाएगी। इससे बस्तर सीधे समुद्री बंदरगाह और वैश्विक व्यापार नेटवर्क से जुड़ जाएगा। परियोजना के जरिए परिवहन लागत में कमी आएगी और बस्तर की कॉफी, इमली, महुआ उत्पाद व ढोकरा शिल्प जैसे स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर दाम मिलेंगे।