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भीतरखाने का कलमकार
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जहां आवाज कम हो जाए, समझ लीजिए वहां फुसफुसाहटें काम कर रही हैं ... कुर्सियों के नीचे सरकती फाइलें

हर सूबे की अपनी एक आवाज होती है…कुछ खबरें मंच से बोली जाती हैं, कुछ प्रेस नोट में लिखी जाती हैं और कुछ गलियारों, बंद कमरों, चाय टेबलों और फुसफुसाहटों में जन्म लेती हैं। भीतरखाने का कलमकार उन्हीं अनकही हलचलों का साप्ताहिक आईना है। यहाँ सत्ता की सुगबुगाहट है, बाबुओं के गलियारों की आहट है, समाज की चुप्पियों के पीछे छिपे संकेत हैं और उन चर्चाओं की भनक भी, जो खुलकर कभी सामने नहीं आतीं। यह कॉलम आरोप नहीं लगाता, इशारों में उन तस्वीरों को उकेरता है, जिन्हें लोग समझते तो हैं… मगर कहते नहीं। व्यंग्य, संकेत और भीतर की खबरों के इस सफर में हर सप्ताह मिलेगा सिस्टम का एक नया चेहरा। क्योंकि…जो सामने दिखता है, कहानी अक्सर उसके पीछे शुरू होती है। - कलमकार

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प्रकाशित: 10 May 2026, 09:45 AM · अपडेट: 24 Sep 2026, 06:44 AM
गलियारे से
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

सूबे में इन दिनों मौसम से ज्यादा चर्चा कुर्सियों की है… और कुर्सियों से ज्यादा उन फाइलों की, जो धीरे-धीरे सरक रही हैं। सत्ता के गलियारों में सन्नाटा कभी खाली नहीं होता। जहां आवाज कम हो जाए, समझ लीजिए वहां फुसफुसाहटें काम कर रही हैं। इन दिनों सूबे के एक बड़े दफ्तर में भी कुछ ऐसा ही माहौल है। ऊपर से सब सामान्य दिख रहा है। बैठकें हो रही हैं, निर्देश जारी हो रहे हैं, फोटो खिंच रहे हैं… लेकिन भीतरखाने की हवा कुछ और कहानी कह रही है।

कहा जा रहा है कि अफसरान इन दिनों अपनी कुर्सी से ज्यादा दिल्ली के फोन पर भरोसा कर रहे हैं। वजह भी खास है। पिछले कुछ महीनों में जिन फाइलों को तेजी से दौड़ना था, वे अलमारी में आराम कर रही हैं… और जो फाइलें शांत रहनी चाहिए थीं, वे अचानक टेबल से टेबल घूम रही हैं। बड़े दफ्तर के गलियारों में चर्चा यह भी है कि कुछ लोग ट्रांसफर सूची आने से पहले ही धन्यवाद देना शुरू कर चुके थे। दिलचस्प बात यह है कि सूची बाहर आने के पहले ही बधाइयां घुमने लगी थी। उधर राजनीति के एक पुराने खिलाड़ी इन दिनों फिर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। वर्षों तक शांत रहने के बाद अचानक उनकी चाय बैठकों की संख्या बढ़ गई है। सूबे के एक खास होटल में देर रात हुई मुलाकात ने कई लोगों की नींद हल्की कर दी है। अंदर क्या बात हुई, यह तो बाहर नहीं आया… लेकिन अगले दिन कुछ चेहरों की मुस्कान जरूर गायब दिखी।

बाबू गलियारे की अपनी अलग कहानी है। एक विभाग में इन दिनों आदेश कम और संकेत ज्यादा चल रहे हैं। कर्मचारी समझ नहीं पा रहे कि साहब नाराज हैं, परेशान हैं या फिर जाने की तैयारी में हैं। फाइलें वापस लौट रही हैं, नोटशीट पर लाल निशान बढ़ रहे हैं और चाय वाले की बिक्री अचानक ऊपर चली गई है।

समाज का आईना भी कम दिलचस्प नहीं। सेवा और संस्कार की बातें करने वाले कुछ चेहरे इन दिनों पोस्टर और फोटो फ्रेम के आकार को लेकर ज्यादा चिंतित बताए जा रहे हैं। कार्यक्रम छोटा हो तो चलेगा… लेकिन फोटो बड़ी होनी चाहिए। आखिर समाजसेवा का असली पैमाना अब कैमरे की चौड़ाई से तय होने लगा है।

और हां…सूबे के एक नेता जी इन दिनों विरोधियों से कम, अपने समर्थकों से ज्यादा परेशान बताए जा रहे हैं। कारण यह कि समर्थक अब भाई साहब कम और अगला चुनाव ज्यादा बोलने लगे हैं। और इधर...

... और सुशासन के साथ तबादला तिहार

छत्तीसगढ़ में इन दिनों पूरा सिस्टम सुशासन तिहार मोड में है। मुखिया-मंत्री से लेकर अफसर तक गांव-गांव घूम रहे हैं, जनता से आवेदन ले रहे हैं और कैमरों के सामने जवाबदेही का प्रदर्शन कर रहे हैं,लेकिन इसी बीच सरकार ने 42 आईएएस अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट जारी कर दी, जिसमें 7 जिलों के कलेक्टर भी बदल गए। अब प्रशासनिक गलियारों में सवाल यही घूम रहा है कि ये सुशासन समीक्षा का नतीजा था या फिर सिर्फ रूटीन प्रशासनिक फेरबदल? वैसे परंपरा यही रही है कि जब मुखिया प्रदेशभर का दौरा कर लें, तब कुछ अफसरों की कुर्सियां भी घूम जाती हैं। संदेश साफ रहता है कि काम ठीक नहीं तो कुर्सी भी सुरक्षित नहीं। मगर इस बार अंदरखाने वाले भी कोई ठोस वजह नहीं बता पा रहे। हां, जिन अफसरों को मंत्रालय या पसंदीदा पोस्टिंग मिल गई, उनके चेहरे जरूर खिले हुए हैं। क्योंकि अब किसी भी विभाग में गड़बड़ी निकले तो एक लाइन का जवाब तैयार है कि ये तो पिछले वाले का किया धरा है। वैसे इसका एक और पहलू है...

... पहलू है 72 घंटे में ट्रांसफर वापसी

इस ट्रांसफर लिस्ट की सबसे दिलचस्प कहानी रही एक आईएएस अफसर का 72 घंटे वाला तबादला। पहले आदेश निकला, फिर संशोधन भी आ गया। पुष्पा साहू को कोरिया जिले का कलेक्टर बनाया गया था, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें वापस माध्यमिक शिक्षा मंडल भेज दिया गया। सरकारी गलियारों में वजह व्यक्तिगत परेशानी बताई जा रही है, जबकि चर्चा ये है कि बच्चे के बोर्ड एग्जाम ने प्रशासनिक आदेश तक रुकवा दिया। अब सिस्टम में लोग मजाक कर रहे हैं कि बोर्ड परीक्षा नई कैडर पॉलिसी बन चुकी है। अफसरों के बीच ये केस अब उदाहरण की तरह सुनाया जा रहा है कि अगर आग्रह मजबूत हो तो ट्रांसफर ऑर्डर भी ज्यादा दिन टिकता नहीं। वहीं...

...वहीं, दुर्ग में साहब की तूती बोल

 दुर्ग जिले के एक बड़े पुलिस अफसर की इन दिनों खूब चर्चा है। साहब का सिस्टम ऐसा सेट बताया जा रहा है कि उनके दो-चार खास चेले भी स्थानीय सत्ता का समानांतर मॉडल चला रहे हैं। कहा जा रहा है कि बंधा कारोबार पूरी रफ्तार से चल रहा है और महादेव की कृपा भी भरपूर बरस रही है। बाकी अफसरों और कर्मचारियों का हाल बेहाल बताया जा रहा है। कोई सस्पेंशन से परेशान है तो कोई वेतन वृद्धि रोकने की कार्रवाई से। महिला अफसरों के सम्मान को लेकर भी विभाग के भीतर अच्छी फुसफुसाहट नहीं है। लेकिन साहब का प्रभाव ऐसा है कि शिकायतें भी फाइल देखकर रास्ता बदल लेती हैं।

... और प्रमोटी आईएएस की चांदी

इन दिनों प्रमोटी आईएएस अफसरों की प्रशासन में खूब पूछ-परख है। अधिकांश जिलों में वही कलेक्टरी संभाल रहे हैं और कई जगह उनकी कार्यशैली भी चर्चा में है। रायपुर से लगे एक जिले के साहब तो अलग ही अंदाज में काम कर रहे हैं। चर्चा है कि हजार-पांच सौ वाले छोटे काम भी सीधे टॉप लेवल पर निपटाए जा रहे हैं। नीचे की व्यवस्था अब सिर्फ दर्शक बनकर रह गई है। कर्मचारी मजाक में कह रहे हैं कि यहां फाइल कम और सीधा संपर्क ज्यादा काम करता है। बात हाई फाई जिम... 

... बात राजधानी के हाई-फाई जिम की

रायपुर का हाई-प्रोफाइल जिम इन दिनों फिटनेस से ज्यादा चर्चाओं के कारण सुर्खियों में है। यहां आम लोग कम, बड़े अफसर, कारोबारी और रसूखदार चेहरे ज्यादा दिखाई देते हैं। लेकिन अंदरखाने में चर्चा ट्रेडमिल की नहीं, हनी ट्रैप मॉडल की हो रही है। कानाफूसी है कि यहां खूबसूरत चेहरों की बाकायदा तैनाती की गई है। इतना ही नहीं, कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि इसमें एक पुलिस अफसर की भी निवेश हिस्सेदारी है। कौन फिटनेस बना रहा है और कौन फंस रहा है, इसका सच तो वक्त बताएगा… लेकिन राजधानी में फिलहाल जिम से ज्यादा जिम की कहानी वायरल है।

बाकी बातें…अगले रविवार.... कलमकार

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