AI Chatbot: क्या आपने कभी गौर किया है कि लंबे समय तक किसी व्यक्ति के साथ रहने पर उसकी बोलने की शैली, शब्दों का इस्तेमाल या कुछ आदतें अनजाने में हमारी बातचीत का हिस्सा बन जाती हैं? अब इसी तरह का सवाल इंसानों और AI चैटबॉट्स के बीच बढ़ती बातचीत को लेकर सामने आया है। एक नई रिसर्च में यह संभावना जताई गई है कि AI के साथ लगातार और लंबे समय तक बातचीत करने से इंसान के बातचीत करने और खुद को व्यक्त करने के तरीके में बदलाव आ सकता है। रिसर्चर्स ने इस संभावित स्थिति को 'रोबोटॉइड ह्यूमैननेस' (Robotoid Humaneness) नाम दिया है। हालांकि, इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि ChatGPT या किसी दूसरे AI चैटबॉट का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति रोबोट की तरह व्यवहार करने लगेगा।
फिलहाल यह रिसर्च एक सैद्धांतिक ढांचा पेश करती है और इस पर ठोस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए आगे प्रयोग और अध्ययन की जरूरत होगी। यह अध्ययन 19 अगस्त 2026 को 'AI & Society' जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसे यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम, आरहूस यूनिवर्सिटी और लिनियस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है। शोध में खास तौर पर उन AI सिस्टम्स पर ध्यान दिया गया है, जो केवल सवालों के जवाब नहीं देते, बल्कि यूजर की बातचीत, पसंद और व्यवहार के अनुरूप अपने जवाब भी बदलते हैं।
क्या इंसान AI की बातचीत करने की शैली अपनाने लग सकते हैं?
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इंसानों में सामने वाले के व्यवहार को अनजाने में अपनाने की प्रवृत्ति होती है। मनोविज्ञान में इसे 'मिररिंग' कहा जाता है। आमतौर पर यह प्रक्रिया रोजमर्रा की बातचीत में देखने को मिलती है। किसी व्यक्ति के साथ लंबे समय तक बातचीत करने पर उसके कुछ शब्द, बोलने का अंदाज या बातचीत करने का तरीका हमारी अपनी भाषा में भी दिखाई देने लगता है। रिसर्चर्स का सवाल है कि क्या इसी तरह की प्रक्रिया AI के साथ लगातार बातचीत करने पर भी हो सकती है। आज के AI चैटबॉट पहले के पारंपरिक सॉफ्टवेयर से काफी अलग हैं। वे बातचीत का संदर्भ समझने, यूजर की पसंद को पहचानने और जवाबों को उसके अनुरूप ढालने की कोशिश करते हैं। ऐसे में लंबे समय तक AI के साथ बातचीत करने वाला व्यक्ति भी उन तरीकों को अपनाने लग सकता है, जिनसे उसे सिस्टम से बेहतर और अधिक प्रभावी जवाब मिलते हैं।
'रोबोटॉइड ह्यूमैननेस' का मतलब क्या है?
रिसर्च पेपर में 'रोबोटॉइड ह्यूमैननेस' शब्द का इस्तेमाल उस संभावित स्थिति को समझाने के लिए किया गया है, जिसमें इंसान AI के लिए खुद को अधिक आसानी से समझ आने वाले तरीके से व्यक्त करने लगे। मसलन, यूजर अपने सवालों को ज्यादा स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से पूछ सकता है, खास शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है या अपने विचारों को ऐसे ढंग से पेश करने लग सकता है, जिससे AI बेहतर प्रतिक्रिया दे। रिसर्चर्स ने इसके लिए तीन चरणों वाले मिररिंग प्रोसेस का एक मॉडल प्रस्तावित किया है। पहले चरण में इंसान AI के साथ बातचीत करता है। इसके बाद AI उस बातचीत के आधार पर यूजर की पसंद और व्यवहार से जुड़ी जानकारी को समझता है और उसी के अनुरूप जवाब देता है। लगातार बातचीत के दौरान यूजर भी उन तरीकों को अपनाना शुरू कर सकता है, जिन पर AI अधिक प्रभावी प्रतिक्रिया देता है। हालांकि, यही वह हिस्सा है जिसे लेकर अभी आगे शोध की जरूरत है। यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा बदलाव सभी लोगों में होगा या नहीं और यदि होगा तो उसकी तीव्रता कितनी होगी।AI का फीडबैक इंसान की सोच को भी प्रभावित कर सकता है
रिसर्च का दायरा सिर्फ भाषा या बातचीत की शैली तक सीमित नहीं है। इसमें यह संभावना भी सामने रखी गई है कि AI से मिलने वाला लगातार फीडबैक किसी व्यक्ति के खुद को देखने के नजरिए पर असर डाल सकता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई AI किसी व्यक्ति के विचारों या फैसलों को बार-बार सकारात्मक और सही बताता है, तो संभव है कि वह व्यक्ति अपनी सोच को लेकर पहले से ज्यादा आश्वस्त महसूस करने लगे। वहीं, लगातार नकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने पर आत्मविश्वास प्रभावित होने की संभावना भी हो सकती है। लेकिन शोधकर्ता यह दावा नहीं कर रहे हैं कि AI का इस्तेमाल करने वाले हर व्यक्ति पर ऐसा प्रभाव पड़ेगा। व्यक्ति का स्वभाव, AI का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है, बातचीत कितनी लंबी है और AI किस तरह प्रतिक्रिया देता है—इन सभी कारकों की भूमिका हो सकती है। फिलहाल 'रोबोटॉइड ह्यूमैननेस' को एक शोध परिकल्पना और सैद्धांतिक मॉडल के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसके वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए आने वाले समय में नियंत्रित प्रयोगों और लंबे समय तक किए जाने वाले अध्ययनों के नतीजे महत्वपूर्ण होंगे।

