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शांति समझौते पर दस्तखत जिनेवा में
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पाकिस्तान को बड़ा झटका : अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर दस्तखत तो जिनेवा में होंगे, पर शहबाज शरीफ ने कहा- मेज़बान हम ही हैं

अमेरिका और ईरान के बीच मध्य पूर्व में चल रहे तनाव को खत्म करने के लिए एक संभावित शांति समझौते की रूपरेखा तैयार होने का दावा किया गया है, जिस पर 19 जून को जिनेवा में हस्ताक्षर होने की बात कही गई है। इस समझौते में युद्धविराम, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को व्यापार के लिए फिर से खोलने जैसे प्रावधान बताए गए हैं।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 15 Jun 2026, 05:26 PM · अपडेट: 26 Oct 2026, 10:03 PM
इस्लामाबाद
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

मध्य पूर्व (Middle East) में महीनों से जारी भीषण युद्ध पर आखिरकार पूर्ण विराम लगने जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक शांति समझौते की रूपरेखा तैयार हो चुकी है, जिस पर आगामी शुक्रवार, 19 जून को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में हस्ताक्षर किए जाएंगे।

इस बीच, खुद को इस महा-समझौते का मुख्य सूत्रधार बताने वाले पाकिस्तान को एक बड़ा राजनयिक झटका लगा है। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इस ऐतिहासिक पल का गवाह उसका अपना कूटनीतिक केंद्र इस्लामाबाद बनेगा, लेकिन अमेरिका और ईरान दोनों ने अंतिम मुहर लगाने के लिए जिनेवा को चुना।

कार्यक्रम भले जिनेवा में, पर मेज़बान पाकिस्तान'

सोमवार देर रात इस महा-समझौते का आधिकारिक ऐलान होने के बाद, पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश का पक्ष रखा। पाकिस्तान के हाथ से आयोजन छिनने की टीस को छुपाते हुए उन्होंने कहा:

"इस ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर का कार्यक्रम शुक्रवार, 19 जून को जिनेवा में तय हुआ है। लेकिन अल्लाह के रहम से, इस पूरे आयोजन की आधिकारिक मेज़बानी पाकिस्तान ही करेगा।"

भले ही पाकिस्तानी पीएम इसे अपनी कूटनीतिक जीत बता रहे हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि दोनों महाशक्तियों ने पाकिस्तान की धरती पर हस्ताक्षर न करके इस्लामाबाद को कड़ा संदेश दिया है।

क्या बदलेगा इस डील से?

इस ऐतिहासिक समझौते के तहत दोनों देश मध्य पूर्व में शांति बहाली के लिए एक व्यापक रूपरेखा (Framework) पर सहमत हुए हैं, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • पूर्ण युद्धविराम: अमेरिका और ईरान लेबनान सहित सभी मोर्चों पर अपनी सैन्य कार्रवाइयों को तुरंत और हमेशा के लिए रोकने पर सहमत हो गए हैं।

  • आर्थिक प्रतिबंधों का अंत: अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाई गई कड़ी आर्थिक नाकेबंदी और प्रतिबंधों को हटाया जाएगा।

  • वैश्विक व्यापार की बहाली: रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल की आवाजाही के लिए फिर से पूरी तरह खोल दिया जाएगा।

पाकिस्तानी पीएम ने दोनों देशों के नेतृत्व की तारीफ करते हुए कहा कि 3 महीने और 16 दिनों की बेहद जटिल और तनावपूर्ण बातचीत के बाद यह ऐतिहासिक सफलता मिली है।

पाकिस्तान के दावों की जमीनी हकीकत

फरवरी के अंत में शुरू हुए इस युद्ध में अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर भीषण हमले किए थे, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके परिवार समेत कई शीर्ष कमांडर मारे गए थे। इस संकट के बीच पाकिस्तान ने खुद को एक वैश्विक मध्यस्थ (Mediator) के रूप में पेश करने की पुरज़ोर कोशिश की।

अप्रैल के महीने में इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच बातचीत के पहले दौर की मेज़बानी भी की गई थी। लेकिन कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पाकिस्तान की भूमिका एक निष्पक्ष मध्यस्थ की नहीं, बल्कि सिर्फ संदेशों को इधर से उधर पहुंचाने वाले 'एक डाकिए' (Messenger) जैसी ही रही।

किसे मिलेगा शांति का असली श्रेय?

पाकिस्तान भले ही अमेरिका-ईरान के बीच युद्धविराम कराने का पूरा श्रेय खुद लेने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन हकीकत में बाजी कतर मारता दिख रहा है।

देशयुद्धविराम में वास्तविक भूमिका
पाकिस्तानअप्रैल में शुरुआती दौर की वार्ता की मेज़बानी की; केवल संदेशवाहक (Messenger) की भूमिका तक सीमित रहा।
कतरकतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी खुद तेहरान में डटे रहे और पर्दे के पीछे रहकर असली कूटनीतिक गांठें सुलझाईं।
अब पूरी दुनिया की निगाहें 19 जून को जिनेवा में होने वाले इस कार्यक्रम पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि अमेरिका और ईरान इस शांति का सेहरा पाकिस्तान के सिर बांधते हैं या फिर कतर की साइलेंट डिप्लोमेसी को इसका असली विजेता माना जाता है।
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