छत्तीसगढ़ सरकार ने धान खरीदी नियमों में बदलाव करते हुए मठ, मंदिर और अन्य धार्मिक संस्थानों को बड़ी राहत दी है। अब प्रदेश के पात्र धार्मिक संस्थान अपनी कृषि भूमि पर उत्पादित धान को सरकारी खरीदी केंद्रों के माध्यम से बेच सकेंगे। इससे उन संस्थानों को लाभ मिलेगा, जिनके पास खेती योग्य जमीन है और वहां हर साल धान का उत्पादन होता है।
अब तक समर्थन मूल्य पर धान बेचने की सुविधा मुख्य रूप से पंजीकृत किसानों तक सीमित थी। मठ-मंदिर और अन्य धार्मिक संस्थानों की कृषि भूमि से होने वाली उपज सरकारी खरीदी व्यवस्था में शामिल नहीं थी। इस नई व्यवस्था लागू होने के बाद पात्र धार्मिक संस्थान भी धान बिक्री के लिए पंजीयन करा सकेंगे। इसके बाद वे समर्थन मूल्य योजना का लाभ उठा पाएंगे।
कृषि भूमि से होने वाली उपज की होगी खरीदी
प्रदेश में कई मठ, मंदिर और धार्मिक संस्थानों के पास बड़ी मात्रा में कृषि भूमि मौजूद है, और इन जमीनों पर खेती कर प्राप्त होने वाली फसल का उपयोग धार्मिक गतिविधियों और अन्य कार्यों में किया जाता है। अब इन संस्थानों द्वारा उत्पादित धान को भी सामान्य कृषि उपज की तरह सरकारी खरीदी प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।
पंजीयन और जरूरी दस्तावेज होंगे अनिवार्य
नई व्यवस्था का लाभ लेने के लिए मठ-मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को निर्धारित नियमों के अनुसार पंजीयन कराना होगा। धान खरीदी केंद्रों पर उपज बेचने के लिए संस्थान को भूमि संबंधी दस्तावेज और अन्य जरूरी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। इसके बाद ही खरीदी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
सरकार ने क्यों किया बदलाव?
सरकार का कहना है कि धान खरीदी व्यवस्था को अधिक व्यापक और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया है। इस बदलाव से धान उत्पादन करने वाले सभी पात्र संस्थानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सकेगा। साथ ही सरकारी खरीदी व्यवस्था का दायरा भी बढ़ेगा।
सरकार का उद्देश्य व्यवस्था को अधिक व्यापक बनाना
सरकार का कहना है कि धान खरीदी व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाने के उद्देश्य से यह बदलाव किया गया है। इससे प्रदेश में धान उत्पादन करने वाले सभी पात्र संस्थानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सकेगा। साथ ही सरकारी खरीदी व्यवस्था में पारदर्शिता और विस्तार भी आएगा।धान उत्पादन करने वाले संस्थानों को मिलेगी राहत
छत्तीसगढ़ में धान प्रमुख फसल है और हर साल बड़ी संख्या में किसान समर्थन मूल्य पर धान बेचते हैं। अब मठ-मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को भी इस व्यवस्था से जोड़ने के बाद धान खरीदी का दायरा बढ़ेगा। माना जा रहा है कि इस फैसले से लंबे समय से कृषि गतिविधियों में शामिल धार्मिक संस्थानों को आर्थिक लाभ मिलेगा।