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CG High Court का बड़ा फैसला : कर्मचारी की मौत पर मुआवजे में ‘सैलरी कैपिंग’ खत्म, अब वास्तविक वेतन बनेगा आधार

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद मिलने वाले मुआवजे की गणना अब किसी तय या काल्पनिक वेतन सीमा (कैपिंग) के आधार पर नहीं होगी, बल्कि मृतक की वास्तविक सैलरी को ही आधार माना जाएगा।

कीर्तिमान ब्यूरो
कीर्तिमान ब्यूरो
07 May 2026, 05:30 PM
रायपुर/ बिलासपुर

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मृतक कर्मचारियों के परिजनों के हित में एक ऐतिहासिक और राहत भरा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी कर्मचारी की मृत्यु के बाद मिलने वाले मुआवजे की गणना अब किसी पुरानी या काल्पनिक वेतन सीमा के आधार पर नहीं की जा सकती। मुआवजा तय करने का एकमात्र आधार कर्मचारी की मृत्यु के समय की वास्तविक (Actual) सैलरी होगी।

इस फैसले को उन हजारों परिवारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिन्हें अब तक तकनीकी नियमों और वेतन सीमा की वजह से कम मुआवजा मिलता रहा था।

क्या है पूरा मामला

यह मामला जगदलपुर निवासी ट्रक ड्राइवर सत्येंद्र सिंह से जुड़ा है, जिनकी 15 दिसंबर 2017 को सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उनकी मृत्यु के बाद पत्नी, बच्चे और मां ने मुआवजे की मांग करते हुए लेबर कोर्ट में दावा दायर किया था।

लेबर कोर्ट ने सुनवाई के बाद ड्राइवर की मासिक आय 9,880 रुपये मानते हुए करीब 9.49 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।

लेकिन इसके बाद बीमा कंपनी ने इस फैसले को चुनौती दी और कहा कि सरकारी नियमों के अनुसार अधिकतम वेतन 8,000 रुपये ही माना जाना चाहिए। इसी आधार पर कम मुआवजे की मांग की गई थी।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए Chhattisgarh High Court की सिंगल जज बेंच (न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु) ने स्पष्ट टिप्पणी की कि मुआवजे की गणना किसी पुराने, अवास्तविक या तय सीमा वाले वेतन के आधार पर नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने कहा—

“कर्मचारी की मृत्यु के समय जो वास्तविक वेतन था, वही मुआवजे का आधार होना चाहिए। काल्पनिक या सीमित वेतन तय करके परिवार को नुकसान पहुंचाना न्यायसंगत नहीं है।”

कैपिंग सिस्टम पर बड़ा प्रहार

अब तक कई मामलों में बीमा कंपनियां और संबंधित संस्थाएं मुआवजे की गणना के लिए पुरानी “सैलरी कैपिंग” प्रणाली का सहारा लेती थीं, जिसमें अधिकतम वेतन सीमा तय कर दी जाती थी। इससे वास्तविक आय ज्यादा होने के बावजूद मुआवजा कम मिल जाता था।

हाई कोर्ट ने इस पूरी व्यवस्था को गलत ठहराते हुए संकेत दिया कि अब ऐसे किसी भी प्रतिबंधित फॉर्मूले का इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं होगा।

परिवारों को बड़ी राहत

इस फैसले के बाद अब उन मामलों में बड़ा बदलाव आने की संभावना है, जहां मृतक कर्मचारी की वास्तविक आय अधिक होने के बावजूद सीमित वेतन के आधार पर मुआवजा तय किया गया था।

विशेषज्ञों के अनुसार—

  • अब मुआवजा गणना में वास्तविक सैलरी को प्राथमिकता मिलेगी
  • बीमा कंपनियों की अपीलों पर असर पड़ेगा
  • लंबित मामलों में पुनर्विचार की गुंजाइश बढ़ेगी
  • मृतक आश्रित परिवारों को अधिक आर्थिक सुरक्षा मिलेगी

क्यों माना जा रहा है यह फैसला अहम?

यह निर्णय सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे मुआवजा ढांचे पर असर डाल सकता है। खासकर उन परिवारों के लिए यह राहत की खबर है, जिनका जीवन किसी दुर्घटना के बाद आर्थिक संकट में चला गया था।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट का यह रुख “न्यायिक संवेदनशीलता” को दर्शाता है, जिसमें तकनीकी नियमों से ऊपर मानव जीवन और परिवार की वास्तविक जरूरतों को रखा गया है।

आगे क्या होगा असर?

इस फैसले के बाद बीमा कंपनियों और निचली अदालतों के लिए भी यह दिशा-निर्देश जैसा साबित हो सकता है। अब मुआवजा तय करते समय:

  • वास्तविक आय प्रमाणित करना जरूरी होगा
  • कैपिंग आधारित तर्क कमजोर होंगे
  • परिवारों के हितों को प्राथमिकता मिलेगी
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