67 रुपये बिना टिकट लेने का आरोप
बिना टिकट 67 रुपए लेने का था आरोप मामला वर्ष 1994 में शुरू हुआ था। डीटीसी के कंडक्टर राजेंद्र प्रसाद पर आरोप लगा था कि उन्होंने यात्रियों को टिकट जारी किए बिना उनसे 67 रुपए लिए थे। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई और वर्ष 1996 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। बर्खास्तगी के बाद प्रसाद ने डीटीसी के प्रबंध निदेशक के समक्ष अपील की। अपील पर उन्हें बिना बकाया वेतन के दोबारा सेवा में बहाल कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने 1996 से 1998 तक की अवधि का वेतन नहीं मिलने को लेकर औद्योगिक विवाद उठाया।
32 साल बाद DTC की याचिका खारिज
ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी को माना था अवैध औद्योगिक न्यायाधिकरण ने मामले की सुनवाई के बाद प्रसाद के पक्ष में फैसला दिया। ट्रिब्यूनल ने उनकी बर्खास्तगी को अवैध और निराधार माना और डीटीसी को 17 महीने का बकाया वेतन देने का आदेश दिया। इस फैसले से असंतुष्ट DTC ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। वर्ष 2005 में हाई कोर्ट ने औद्योगिक न्यायाधिकरण के आदेश के संचालन पर रोक लगा दी थी।इसके बाद मामला लंबे समय तक अदालत में लंबित रहा। हाई कोर्ट ने DTC की याचिका खारिज की करीब 32 साल से चल रहे इस विवाद पर अब हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए औद्योगिक न्यायाधिकरण के आदेश को बरकरार रखा।
32 साल की देरी पर DTC पर जुर्माना
अदालत ने कहा कि इतने छोटे दावे को लेकर विवाद को असाधारण रूप से लंबी अवधि तक जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान है। पीठ ने यह भी कहा कि इस तरह की लंबी कानूनी प्रक्रिया से सार्वजनिक धन और न्यायिक संसाधनों का अनावश्यक इस्तेमाल होता है। इसी को देखते हुए अदालत ने DTC पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और कंडक्टर के बकाया वेतन से जुड़े ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा।

