छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित डोंगरगढ़ सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र और गौरवशाली इतिहास का जीता-जागता गवाह है। मां बम्लेश्वरी के जयकारों से गूंजने वाली यह पावन धरा इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्तमान में यहाँ धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय सुविधाओं को दुरुस्त करने के लिए कई नए कदम उठाए जा रहे हैं, जिससे न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश से आने वाले पर्यटकों की संख्या में भारी इजाफा देखा जा रहा है।
इतिहास के पन्नों से: राजा कामसेन और मां बम्लेश्वरी की गाथा
डोंगरगढ़ का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही दिलचस्प भी। स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, लगभग 2200 वर्ष पहले यहाँ राजा कामसेन का शासन था, जिन्हें कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था।
राजा कामसेन संगीत और कला के बड़े पारखी थे। उनके दरबार में 'माधवानल' नाम का एक कुशल संगीतकार और 'कामकंदला' नाम की एक बेहद खूबसूरत नृत्यांगना थी। दोनों के बीच अटूट प्रेम था, लेकिन राजा के क्रोध के कारण दोनों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस प्रेम कहानी और राजा कामसेन की भक्ति से जुड़ी हुई है मां बम्लेश्वरी की स्थापना। राजा कामसेन ने ही पहाड़ी के ऊपर मां बम्लेश्वरी (जिन्हें मां बगलामुखी का रूप माना जाता है) के मंदिर का निर्माण करवाया था। 'डोंगर' का अर्थ होता है पहाड़ और 'गढ़' का अर्थ है किला, यानी पहाड़ों पर बसा किला, जो कालान्तर में 'डोंगरगढ़' कहलाया।
मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम: जब थम जाती हैं निगाहें
डोंगरगढ़ की असली रौनक यहाँ आयोजित होने वाले मेलों में देखने को मिलती है। हर साल क्वांर (शारदीय) और चैत्र नवरात्रि के दौरान यहाँ का नजारा अलौकिक होता है।
नवरात्रि मेला: नौ दिनों तक चलने वाले इस भव्य मेले में देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 1600 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर ऊपर मंदिर तक पहुंचना अपने आप में एक अनोखा अनुभव है। जो लोग सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते, उनके लिए रोप-वे की बेहतरीन सुविधा मौजूद है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां: मेले के दौरान जिला प्रशासन और स्थानीय समितियों के सहयोग से विशाल भजन संध्या, लोक नृत्य (जैसे पंथी, सुआ, और कर्मा) और जगरातों का आयोजन किया जाता है। पूरी पहाड़ी को रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है, जो रात के समय आसमान से किसी तैरते हुए सोने के महल जैसी दिखाई देती है।
पदयात्रा की परंपरा: दुर्ग, भिलाई, रायपुर और राजनांदगांव से लाखों की संख्या में युवा और बुजुर्ग पैदल यात्रा (पदयात्री) कर मां के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते हैं। जगह-जगह स्थानीय नागरिकों द्वारा भंडारे और सेवा शिविर लगाए जाते हैं, जो छत्तीसगढ़ की अतिथि देवो भवः की संस्कृति को दर्शाते हैं।
वर्तमान स्थिति: आधुनिकता के पथ पर डोंगरगढ़
आज का डोंगरगढ़ तेजी से बदल रहा है। हालिया स्थिति की बात करें तो, यहाँ बुनियादी ढांचे (Infrastructure) को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
प्रसाद योजना (PRASHAD Scheme): केंद्र सरकार की प्रसाद योजना के तहत डोंगरगढ़ को एक प्रमुख टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत पहाड़ी के नीचे श्री यंत्र के आकार का एक भव्य पिलग्रिम फैसिलिटेशन सेंटर (श्रद्धालु सुविधा केंद्र) बनकर तैयार हो चुका है, जहाँ एक साथ हजारों यात्रियों के रुकने, भोजन और आराम की व्यवस्था है।
इसके अलावा, हाल ही में रेलवे प्रशासन द्वारा डोंगरगढ़ स्टेशन पर ट्रेनों के स्टॉपेज बढ़ाए गए हैं और नवरात्रि के दौरान विशेष 'मेला स्पेशल' ट्रेनें चलाई जा रही हैं, जिससे यात्रियों को आने-जाने में कोई असुविधा न हो। स्थानीय प्रशासन अब न केवल धार्मिक, बल्कि इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा दे रहा है, क्योंकि यहाँ की पहाड़ियां और जलाशय प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करते हैं। कुल मिलाकर, वर्तमान में डोंगरगढ़ अपनी प्राचीन विरासत को सहेजते हुए आधुनिक विकास की एक नई इबारत लिख रहा है।