एसईसीएल बैकुंठपुर क्षेत्र की पाण्डवपारा और झिलमिली भूमिगत खदान के ऊपर स्थित जंगल की जमीन एक बार फिर खतरे के संकेत दे रही है। जंगल क्षेत्र में जगह-जगह से जमीन फटने लगी है और करीब एक माह पहले जिन दरारों को भरकर ऊपर से ढलाई कर बंद किया गया था, वे अब दोबारा दिखाई देने लगी हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित स्थिति सूरजपुर जिले के धरसेड़ी, गोविंदगढ़, बड़सरा, आमाखोखा और खोड़ गांव से लगे जंगल क्षेत्र में सामने आई है। यहां जमीन में लगातार बढ़ रही दरारों को लेकर ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते स्थायी समाधान नहीं किया गया तो बड़ा हादसा हो सकता है। जंगल क्षेत्र में पहले भी जमीन फटने की घटनाएं सामने आई थीं।
नहीं थमी जमीन धंसने की समस्या
इसके बाद एसईसीएल प्रबंधन द्वारा दरारों की भराई कर ऊपर से कंक्रीट की ढलाई कराई गई थी। इस काम में लाखों रुपये खर्च होने की जानकारी सामने आई थी। मरम्मत के बाद उम्मीद थी कि जमीन की स्थिति सामान्य हो जाएगी और दोबारा दरारें नहीं आएंगी। लेकिन कुछ ही समय बाद कोपरझरिया नाला क्षेत्र में फिर से चौड़ी और गहरी दरारें दिखाई देने लगी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन के अंदर लगातार हलचल होने के कारण यह समस्या बनी हुई है
दरारों से निकल रही खदान की हवा
ग्रामीणों के अनुसार, इन दरारों से भूमिगत खदान के भीतर की हवा ऊपर की ओर आ रही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जमीन की सतह के नीचे खदान क्षेत्र तक दरारें पहुंच चुकी हैं। यह स्थिति खदान के अंदर काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर मानी जा रही है। ग्रामीणों ने दावा किया है कि कुछ स्थानों पर नदी का पानी भी इन दरारों के माध्यम से खदान के अंदर रिस रहा है।जंगल में रोज पहुंचते हैं ग्रामीण
प्रभावित क्षेत्र कोई सुनसान इलाका नहीं है। आसपास के गांवों के लोग रोजाना मवेशियों को चराने के लिए इस जंगल क्षेत्र में पहुंचते हैं। इसके अलावा जंगली जानवरों की आवाजाही भी यहां बनी रहती है। जमीन में बनी गहरी दरारें कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रभावित क्षेत्रों में अब तक न तो सुरक्षा के लिए बैरिकेडिंग की गई है और न ही चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं।
पर्यावरण पर भी असर का दावा
भाजपा मंडल अध्यक्ष सुनील साहू ने बताया कि पिछले एक-दो वर्षों से इस क्षेत्र में जमीन फटने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। उन्होंने दावा किया कि कई जंगली जीव इन गड्ढों में गिरकर अपनी जान गंवा चुके हैं। उन्होंने कहा कि भूमिगत खदानों के कारण क्षेत्र के पर्यावरण पर भी असर पड़ रहा है। जंगल क्षेत्र प्रभावित होने के साथ-साथ जलस्तर नीचे जाने की समस्या भी सामने आ रही है।