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हाईकोर्ट का अहम निर्देश : 13 अधिकारियों के ट्रांसफर और प्रमोशन मामले में 90 दिनों में फैसला करे सरकार
बिलासपुर हाईकोर्ट ने 1998 में लोक सेवा आयोग से चयनित 13 अतिरिक्त सहायक विकास आयुक्तों के कैडर ट्रांसफर, वरिष्ठता सूची और नोशनल प्रमोशन से जुड़े मामले में याचिकाकर्ताओं को नया अभ्यावेदन देने की अनुमति दी है। कोर्ट ने शासन को 90 दिनों के भीतर नियमानुसार फैसला लेने के निर्देश दिए हैं।
बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 1998 में लोक सेवा आयोग के जरिए चयनित 13 अतिरिक्त सहायक विकास आयुक्तों के कैडर ट्रांसफर, एकीकृत वरिष्ठता सूची और काल्पनिक पदोन्नति (नोशनल प्रमोशन) से जुड़े मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अपनी मांगों के समर्थन में संबंधित विभाग के समक्ष नया आवेदन प्रस्तुत करने की छूट दी है, जिस पर शासन को तय समय सीमा के भीतर कानूनी रूप से फैसला लेना होगा। यह फैसला न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने मोहित राम कैवर्त एवं अन्य 12 अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। मामले की पृष्ठभूमि 1990 के दशक की है।
नियुक्ति में पंचायत की जगह आदिम जाति विभाग में पदस्थ
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वर्ष 1996 में तत्कालीन मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) ने अतिरिक्त सहायक विकास आयुक्त के पदों के लिए विज्ञापन निकाला था। 1998 में जब उनकी नियुक्ति हुई, तब उन्हें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के बजाय आदिम जाति कल्याण विभाग के अधीन पदस्थ कर दिया गया। अधिकारियों की मुख्य दलील यह है कि उनके पद की प्रकृति और मूल कार्यक्षेत्र पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का ही था।
इसी आधार पर वे लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि:
उनकी सेवाओं को उनके मूल विभाग (पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग) में स्थानांतरित किया जाए।
एक एकीकृत वरिष्ठता सूची बनाई जाए।
वरिष्ठता के आधार पर उन्हें देय काल्पनिक पदोन्नति दी जाए।
याचिका दायर करने वाले अधिकांश रिटायर
अपनी याचिका में अधिकारियों ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के प्रसिद्ध अनुराग सक्सेना बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि समान स्थिति वाले अधिकारियों के पक्ष में अदालत पहले ही निर्णय दे चुकी है, इसलिए उनके साथ भी वही न्याय होना चाहिए। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह मामला वर्ष 2018 से लंबित है और इस दौरान याचिका दायर करने वाले अधिकांश अधिकारी अब सेवानिवृत्त (रिटायर) भी हो चुके हैं।
राहत पाने का दिया नया रास्ता
ऐसी स्थिति में, याचिका के वर्तमान स्वरूप के आधार पर कोई भी नया प्रशासनिक या सेवा-संबंधी लाभ दिया जाना व्यावहारिक नहीं रह गया है। हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर अपनी कोई अंतिम राय दिए बिना याचिका का निपटारा कर दिया और अधिकारियों को राहत पाने का एक नया रास्ता दिया।
कोर्ट के मुख्य निर्देश:
45 दिनों की मोहलत: याचिकाकर्ता आदेश मिलने की तिथि से 45 दिनों के भीतर अपर मुख्य सचिव (आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग) के समक्ष अपनी मांगों के साथ नया अभ्यावेदन (आवेदन) जमा कर सकते हैं।
नजीर का उल्लेख: अधिकारी अपने नए आवेदन में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के अनुराग सक्सेना वाले फैसले के कानूनी पहलुओं को भी शामिल कर सकते हैं।
90 दिनों में निर्णय: शासन के सक्षम प्राधिकारी को आवेदन मिलने की तारीख से 90 दिनों के भीतर कानून और स्थापित विधिक सिद्धांतों के अनुसार इस पर अंतिम निर्णय लेना होगा।
इस आदेश के बाद अब यह जिम्मेदारी राज्य सरकार के पाले में है कि वह तीन महीने के भीतर इस बहुप्रतीक्षित प्रशासनिक मामले का निस्तारण करे।