क्या इंसानी जिंदगी की कीमत अब सिर्फ चुनावी बयानों और राजनीतिक धरनों तक ही सीमित रह गई है? शिवपुरी जिले के रन्नौद थाना क्षेत्र से सामने आई एक खबर ने न केवल हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है, बल्कि समाज में लगातार घटती इंसानियत पर भी गहरा सवालिया निशान लगा दिया है। यहाँ एक दर्दनाक सड़क हादसे के बाद घायल व्यक्ति करीब दो घंटे तक मदद की आस में सड़क किनारे तड़पता रहा, लेकिन न वक्त पर एंबुलेंस पहुँची और न ही पुलिस। हद तो तब हो गई जब मौके पर पहुँचे जनप्रतिनिधियों ने भी तड़पते व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाने की जगह मामले को चुनावी मुद्दा बनाकर सड़क पर सियासत शुरू कर दी। घटना बुधवार शाम करीब 4 बजे की बताई जा रही है।
ट्रैक्टर ने बाइक को मारी टक्कर
खरैह गाँव के रहने वाले 55 वर्षीय जगदीश जोशी (पिता भगवान लाल जोशी) अपनी बाइक से सजाई मार्ग से होते हुए घर लौट रहे थे। इसी दौरान खरैह स्थित पेट्रोल पंप के पास सामने से आ रहे एक अनियंत्रित और तेज रफ्तार ट्रैक्टर ने उनकी बाइक को सीधी टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि जगदीश जोशी छिटककर सड़क पर जा गिरे और गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसे के तुरंत बाद वहाँ राहगीरों और ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। लोगों ने उन्हें उठाकर सड़क किनारे तो बिठा दिया, लेकिन इसके आगे कोई कुछ न कर सका।
एक घंटे बीत जाने के बाद भी नहीं पहुंचा अमला
चौंकाने वाली बात यह रही कि मौके पर दर्जनों लोग मौजूद थे, लेकिन 'पुलिस केस' के झंझट में फँसने के डर से किसी भी राहगीर या ग्रामीण ने हिम्मत नहीं जुटाई कि वे घायल जगदीश को अपनी गाड़ी से अस्पताल पहुँचा सकें। दूसरी तरफ, सिस्टम की लापरवाही का आलम यह था कि घटना के बाद स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों और डायल-100 को लगातार फोन लगाए गए। ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष विजय रघुवंशी का दावा है कि उन्होंने रन्नौद थाना प्रभारी, एसडीएम और तहसीलदार सभी को कई बार कॉल किया, लेकिन एक घंटे से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी कोई प्रशासनिक अमला या पुलिस की गाड़ी मौके पर नहीं पहुँची।सड़क पर बैठकर किया विरोध प्रदर्शन
जब दो घंटे तक कोई सरकारी मदद या एंबुलेंस नहीं पहुँची, तो गुस्साए कांग्रेस कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने घायल (जो बाद में दम तोड़ चुके थे) के पास ही सड़क पर बैठकर विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष विजय रघुवंशी ने आरोप लगाया कि रन्नौद पुलिस और प्रशासन की घोर लापरवाही के कारण समय पर इलाज न मिलने से एक बेगुनाह की जान चली गई। वे मृतक को न्याय दिलाने के नाम पर धरने पर डटे रहे।
किसी ने भी आगे आ के नहीं की मदद
घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों का दर्द कुछ और ही बयां कर रहा था। उनका साफ तौर पर कहना था कि जब इंसान की साँसें चल रही थीं, तब अगर बहसबाजी, भाषणबाज़ी और राजनीति को किनारे रखकर उसे किसी भी निजी वाहन से अस्पताल पहुँचा दिया जाता, तो शायद जगदीश जोशी आज जिंदा होते। यह हादसा सिस्टम की नाकामी तो बयां करता ही है, साथ ही यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि संकट के वक्त जब इंसानियत को आगे आना चाहिए, तब हम राजनीति के चक्रव्यूह में उलझकर किसी की जान दांव पर लगा देते हैं।