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ढैंचा की हरी खाद की फसल
ढैंचा की हरी खाद की फसल
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किसान ने दिखाई नई राह : ढैंचा की खेती से मिट्टी होगी उपजाऊ, बसना के किसान ने पेश की मिसाल

महासमुंद जिले के बसना विकासखंड के प्रगतिशील किसान हिमांशु बंजारे ने 0.80 हेक्टेयर क्षेत्र में ढैंचा की हरी खाद की फसल लगाकर जैविक एवं टिकाऊ खेती की दिशा में पहल की है। कृषि विभाग के अनुसार हरी खाद के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता, नाइट्रोजन की उपलब्धता, जलधारण क्षमता और फसल उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार होता है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 05 Jul 2026, 08:45 AM · अपडेट: 10 Sep 2026, 08:35 AM
महासमुंद
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
जिले के विकासखंड बसना अंतर्गत ग्राम बड़ेसाजापाली के प्रगतिशील किसान हिमांशु बंजारे ने जैविक खेती को अपनाकर टिकाऊ कृषि की दिशा में कदम बढ़ाया है। उन्होंने अपने 0.80 हेक्टेयर कृषि रकबे में ढैंचा की हरी खाद की फसल बोई है, जो वर्तमान में लगभग 30 दिन की हो चुकी है। हिमांशु बंजारे ने बताया कि ढैंचा की फसल को खेत में पलटकर हरी खाद के रूप में उपयोग किया जाएगा। 
इससे भूमि की उर्वराशक्ति में सुधार होगा, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी तथा आगामी फसल की उत्पादकता में वृद्धि होने की संभावना है। उनका कहना है कि जैविक खेती अपनाने से खेती की लागत कम होने के साथ-साथ मिट्टी का स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।

अन्य किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील

उन्होंने अन्य किसानों से भी अपील की है कि वे ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलों का उपयोग कर प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती को बढ़ावा दें। उप संचालक कृषि एफ.आर. कश्यप ने बताया कि हरी खाद ऐसी फसलें हैं जिन्हें विशेष रूप से मिट्टी की उर्वरता और संरचना को बढ़ाने और बनाए रखने के लिए उगाया जाता है। इन्हें आमतौर पर सीधे या फिर मिट्टी से निकालकर खाद बनाने के बाद वापस मिट्टी में मिला दिया जाता है। हरी खाद का उपयोग दलहनी फसलों में सन, ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग, ग्वार आदि फसलों का उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इन फसलों की वृद्धि शीघ्र एवं कम समय में हो जाती है। 

मिट्टी की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता में होता है सुधार

पत्तियाँ बड़ी वजनदार एवं बहुत संख्या में रहती है एवं इनकी उर्वरक तथा जल की आवश्यकता कम होती है, जिससे कम लागत में अधिक कार्बनिक पदार्थ प्राप्त हो जाता है। यह मृदा में नाइट्रोजन की भरपूर आपूर्ति करती है। 
बोआई के 35-40 दिनों में (फूल आने से पहले) के बाद पलटने से 50-60 किग्रा./हे. नाइट्रोजन प्रदान करती है। हरी खाद के प्रयोग में मृदा भुरभुरी, वायु संचार में अच्छी, जलधारण क्षमता में वृद्धि, अम्लीयता, क्षारीयता में सुधार एवं मृदा क्षरण में भी कमी होती है। हरी खाद के प्रयोग से मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता बढ़ती है तथा मृदा की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है।
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