Gajab Raat Review: नीरज पांडे, मनोज बाजपेयी और दिव्या दत्ता की तिकड़ी जब भी साथ आती है, तो दर्शकों की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से बहुत बढ़ जाती हैं। 'स्पेशल 26' जैसी बेहतरीन फिल्म देने वाले इस दल से हर बार कुछ अलग और दमदार की आस रहती है। अब यह टीम ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix पर अपनी नई फिल्म 'गजब रात' के साथ आ चुकी है। याद दिला दें कि यह वही फिल्म है जिसका शुरुआती टाइटल 'घूसखोर पंडत' था और इसी साल फरवरी में इसके नाम को लेकर काफी विवाद भी हुआ था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद मेकर्स ने इसका नाम बदलकर 'गजब रात' कर दिया और अब यह दर्शकों के बीच स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध है। हालांकि, फिल्म उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है, आइए जानते हैं।
क्या है 'गजब रात' की कहानी?
फिल्म की कहानी अजय निर्वित (मनोज बाजपेयी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक भ्रष्ट सब-इंस्पेक्टर है। उसकी वर्दी का असली मकसद जनता की सेवा करना नहीं, बल्कि अवैध तरीके से अपनी जेबें भरना है। एक रात उसकी ड्यूटी पर एक ऐसा मामला आता है जिसमें चलती कार से एक घायल लड़की को सड़क पर फेंक दिया जाता है। इस केस में अचानक कई बड़े और रसूखदार चेहरों की एंट्री होती है। समाजसेवी नेहा प्रभु (श्रद्धा दास) के साथ-साथ सीबीआई ऑफिसर नवीन मधोक (अक्षय ओबेरॉय) और एनआईए अधिकारी करण गिल (साकिब सलीम) भी इस मामले में गहरी दिलचस्पी दिखाने लगते हैं। लालची और भ्रष्ट अजय को लगता है कि इस बार उसकी सचमुच लॉटरी लग गई है और वह इस केस से मोटी रकम वसूल सकता है।
मूवी रिव्यू: अभिनय मजबूत, पर पटकथा कमजोर
फिल्म की शुरुआत काफी तेज और दमदार अंदाज में होती है। लेखक-निर्देशक रितेश शाह और निर्माता नीरज पांडे ने मिलकर अजय निर्वित का किरदार बहुत ही रोचक ढंग से गढ़ा है। इस किरदार को अभिनेता मनोज बाजपेयी ने अपनी मंझी हुई और सहज अदाकारी से पर्दे पर जीवंत कर दिया है। कहना गलत नहीं होगा कि मनोज बाजपेयी ही इस फिल्म की सबसे बड़ी और इकलौती मजबूत कड़ी हैं। उनकी लाजवाब एक्टिंग एक भ्रष्ट, शातिर और खुदगर्ज पुलिसवाले के किरदार को भी स्क्रीन पर दिलचस्प बना देती है। शुरुआत में सीबीआई और एनआईए अधिकारियों की एंट्री से फिल्म में एक अलग ही सस्पेंस पैदा होता है, जो दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखता है।
फिल्म की शुरुआत काफी तेज और दमदार अंदाज में होती है। लेखक-निर्देशक रितेश शाह और निर्माता नीरज पांडे ने मिलकर अजय निर्वित का किरदार बहुत ही रोचक ढंग से गढ़ा है। इस किरदार को अभिनेता मनोज बाजपेयी ने अपनी मंझी हुई और सहज अदाकारी से पर्दे पर जीवंत कर दिया है। कहना गलत नहीं होगा कि मनोज बाजपेयी ही इस फिल्म की सबसे बड़ी और इकलौती मजबूत कड़ी हैं। उनकी लाजवाब एक्टिंग एक भ्रष्ट, शातिर और खुदगर्ज पुलिसवाले के किरदार को भी स्क्रीन पर दिलचस्प बना देती है। शुरुआत में सीबीआई और एनआईए अधिकारियों की एंट्री से फिल्म में एक अलग ही सस्पेंस पैदा होता है, जो दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखता है।
किरदारों के साथ न्याय नहीं
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसके सह-कलाकारों का इस्तेमाल है। कहानी का रुख बदलते ही अक्षय ओबेरॉय, साकिब सलीम और श्रद्धा दास जैसे कलाकारों के किरदार एकदम बेमानी और कमजोर लगने लगते हैं। स्क्रिप्ट में उनके लिए करने को कुछ खास नहीं बचता। इसके बावजूद, अक्षय ओबेरॉय ने अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है और उन्होंने अपने हिस्से का काम अच्छे से निभाया है। दिव्या दत्ता और श्रद्धा दास अपने-अपने रोल्स में फिट बैठती हैं, जबकि अजय के भ्रष्ट बॉस के रूप में राजीव गुप्ता काफी असरदार लगे हैं। वहीं, साकिब सलीम, कीकू शारदा और नुसरत भरूचा जैसे कलाकारों को अपनी कला दिखाने का ज्यादा मौका ही नहीं मिल पाया।







