Ganesh Idol Making: गणेश चतुर्थी के त्योहार को लेकर पूरे क्षेत्र में उत्साह का माहौल है। पर्व से ठीक पहले मूर्तिकारों के कार्यशालाओं में युद्धस्तर पर काम चल रहा है। महीनों से मिट्टी को आकार दे रहे कलाकार अब बप्पा की प्रतिमाओं के रंग-रोगन, साज-सज्जा और चेहरे की बारीकियों को चमकाने में दिन-रात एक किए हुए हैं। रंगों की छटा बिखरते ही भगवान गणेश का स्वरूप और अधिक मनोहारी और जीवंत नजर आने लगा है।
चार दशकों का अनुभव और कला के प्रति समर्पण
लखौली क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम नारा के निवासी नारायण धीवर पिछले 40 वर्षों से देवी-देवताओं की मूर्तियां गढ़ रहे हैं। इस साल उन्हें छोटी-बड़ी मिलाकर करीब 55 गणेश प्रतिमाओं के ऑर्डर मिले हैं। चतुर्थी की तारीख करीब आते ही उनके ठिकाने पर दिन-रात काम चल रहा है। नारायण के लिए मूर्ति कला सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है, जिसे वे दशकों से सहेजते आ रहे हैं।
5 हजार से लेकर 40 हजार तक की प्रतिमाएं तैयार
श्रद्धालुओं और गणेशोत्सव समितियों की पसंद और बजट को ध्यान में रखते हुए इस बार अलग-अलग डिजाइन और आकार की मूर्तियां बनाई गई हैं। कार्यशाला में सबसे छोटी मूर्ति की कीमत लगभग 5,000 रूपए है, जबकि भव्य और विशेष सजावट वाली बड़ी प्रतिमाओं का दाम 40,000 रूपए तक रखा गया है। समितियों की मांग के अनुसार मूर्तियों के मुकुट, वस्त्र और आभूषणों में भी विविधता देखने को मिल रही है।

