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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : पिछड़ा वर्ग आयोग को नहीं है पैसे की रिकवरी का अधिकार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग केवल सलाहकार संस्था है और उसे व्यावसायिक विवादों में धनराशि की रिकवरी का आदेश देने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने आयोग द्वारा जारी रिकवरी आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए निरस्त कर दिया।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 02 Jul 2026, 11:21 AM · अपडेट: 12 Jul 2026, 05:25 PM
बिलासपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग केवल सलाहकार और सिफारिश करने वाली संस्था है। आयोग को किसी व्यावसायिक (कमर्शियल) विवाद में धनराशि की वसूली (रिकवरी) का आदेश देने का कानूनी अधिकार नहीं है। 

अदालत ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1995 के तहत आयोग की भूमिका शिकायतों की जांच, सुझाव देने और राज्य सरकार को सिफारिश करने तक सीमित है। वह किसी सक्षम न्यायिक या प्रशासनिक प्राधिकारी की तरह रिकवरी का आदेश जारी नहीं कर सकता। 

हार्वेस्टर सौदे से शुरू हुआ पूरा विवाद

यह फैसला जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने उस रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा 23 सितंबर 2022 को जारी आदेश को चुनौती दी गई थी। मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता कमला मोटर्स ने 21 लाख रुपये में एक हार्वेस्टर मशीन बेचने का सौदा किया था। इस सौदे के तहत खरीदार ने 30 हजार रुपये अग्रिम राशि के रूप में जमा किए थे। तय समय के भीतर बैंक से फाइनेंस स्वीकृत नहीं हो पाने और कोविड-19 महामारी के कारण मशीन की डिलीवरी में देरी होने से सौदा समय पर पूरा नहीं हो सका। बाद में फाइनेंस मिलने के बाद वाहन डिलीवरी के लिए उपलब्ध करा दिया गया, लेकिन खरीदार ने सौदा रद्द कर दिया और आयोग सहित विभिन्न अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई।

आयोग ने कलेक्टर को दिया था वसूली का निर्देश

शिकायत पर सुनवाई के बाद आयोग ने संबंधित कलेक्टर को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता से 1 लाख 26 हजार 500 रुपये की वसूली कर यह राशि खरीदार को दिलाएं। इस आदेश को चुनौती देते हुए कमला मोटर्स ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता का कहना था कि आयोग के पास किसी भी व्यक्ति या संस्था से धनराशि की रिकवरी कराने का अधिकार नहीं है और उसने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया है।

धारा 9 की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने बताया अधिकार क्षेत्र

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1995 की धारा 9 का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि इस कानून में आयोग को केवल सलाह देने, जांच करने और राज्य सरकार को आवश्यक सिफारिशें भेजने की जिम्मेदारी दी गई है। आयोग की सिफारिशें सामान्य परिस्थितियों में सरकार के लिए महत्वपूर्ण और कई मामलों में बाध्यकारी हो सकती हैं, लेकिन इससे आयोग को न्यायिक अधिकार या सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त नहीं हो जातीं।

सीमित शक्तियों से आयोग नहीं बन जाता सिविल कोर्ट

कोर्ट ने अपने फैसले में पूर्व के कई न्यायिक निर्णयों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि किसी आयोग को जांच या पूछताछ के उद्देश्य से सिविल कोर्ट की कुछ सीमित शक्तियां दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि वह स्वयं सिविल कोर्ट बन जाता है। इसलिए आयोग किसी भी व्यावसायिक विवाद में धनराशि की रिकवरी का बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आयोग को केवल अपने वैधानिक अधिकारों के दायरे में रहकर ही कार्य करना होगा। 

सीमित शक्तियों से आयोग नहीं बन जाता सिविल कोर्ट

इसलिए वह किसी पक्ष के खिलाफ धन वसूली, क्षतिपूर्ति या भुगतान का बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता।हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तुत विवाद पूरी तरह एक हार्वेस्टर मशीन की बिक्री से जुड़े व्यावसायिक लेन-देन का मामला था। ऐसे मामलों में धनराशि की वसूली या अनुबंध से जुड़े विवादों का निपटारा सक्षम न्यायालय या विधि द्वारा अधिकृत प्राधिकारी ही कर सकता है। आयोग द्वारा याचिकाकर्ता से 1,26,500 रुपये की वसूली कर उसे प्रतिवादी को भुगतान कराने का निर्देश देना उसके वैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर था। अदालत ने कहा कि ऐसे आदेश को केवल सिफारिश नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसमें सीधे धन वसूली का निर्देश दिया गया था।

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