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अबूझमाड़ के गांव में पहली बार फहराया गया तिरंगा
अबूझमाड़ के गांव में पहली बार फहराया गया तिरंगा
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लाल आतंक पर भारी देशभक्ति : अबूझमाड़ के 9 गांवों में आजादी के बाद पहली बार फहरा तिरंगा

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के नौ गांवों में पहली बार बिना नक्सली खौफ के स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। ग्रामीणों ने तिरंगा फहराकर लोकतंत्र और सुरक्षित भविष्य की ओर नए कदम का संदेश दिया।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 16 Aug 2026, 09:13 AM · अपडेट: 01 Oct 2026, 09:36 AM
नारायणपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
दशकों तक जिस अबूझमाड़ की पहचान खौफ, गोलियों की गूंज और लाल आतंक से होती थी, वहां इस बार का स्वतंत्रता दिवस एक नया इतिहास लिख गया। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के घोर नक्सल प्रभावित माने जाने वाले अबूझमाड़ के नौ गांवों ने आजादी के बाद पहली बार खुली हवा में सांस ली और पूरे गर्व के साथ तिरंगा फहराया। कभी माओवादियों के फरमान से सहमने वाले इन गांवों में जब 'भारत माता की जय' के नारे गूंजे, तो हर किसी की आंखें खुशी और नए विश्वास से चमक उठीं। जिन नौ गांवों ने इस ऐतिहासिक पल को जिया, उनमें कोरसकोडो, हचेकोटी, आदनार, बोटेर, कुमनार, दिवालुर, गुंडेकोट, रेकापाल और रासमेटा शामिल हैं। 

नक्सलियों के डर ने मुख्य त्योहारों से काटा था

दरअसल, 31 मार्च 2026 को इस इलाके को माओवाद मुक्त घोषित किया गया था। इसके बाद यह पहला मौका था, जब यहां के बाशिंदों ने बिना किसी खौफ के अपना राष्ट्रीय पर्व मनाया। सालों तक नक्सलियों के डर ने इन ग्रामीणों को देश के मुख्य त्योहारों से काट कर रखा था। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है और ग्रामीण लोकतंत्र की मुख्यधारा से कदम ताल करते दिख रहे हैं। इन गांवों तक पहुंचना आज भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। मिसाल के तौर पर बोटेर गांव को ही लें। 

पहली बार राष्ट्रध्वज फहराया
पहली बार फहराया राष्ट्रध्वज 

नारायणपुर जिला मुख्यालय से यह करीब 120 किलोमीटर दूर है। ओरछा विकासखंड मुख्यालय से 55 किलोमीटर का सफर तय कर कुडमेल पुलिस शिविर तक तो दोपहिया वाहन से किसी तरह पहुंचा जा सकता है, लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू होती है। घने जंगलों, उफनते नदी-नालों और कीचड़ भरे पहाड़ी रास्तों को पार करते हुए करीब 9 किलोमीटर का पैदल सफर तय करना पड़ता है। महज 60 लोगों की आबादी वाले इस छोटे से गांव में जब पहली बार राष्ट्रध्वज फहराया गया, तो वह पल ग्रामीणों के लिए बेहद भावुक कर देने वाला था। 

गांव में नहीं पहले जैसा डर 

मार्च 2026 में सुरक्षा बलों के शिविर स्थापित होने के बाद से ही यहां के हालात तेजी से सुधरे हैं। प्रशासन और जवानों की लगातार पहुंच ने ग्रामीणों के दिलों से दहशत को खत्म कर दिया है। बोटेर गांव की अतिथि शिक्षक सुनीता और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि अब गांव में पहले जैसा डर नहीं है। बच्चे अब बिना किसी खौफ के स्कूल जा पा रहे हैं। इन ग्रामीणों के लिए तिरंगा सिर्फ राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि एक सुरक्षित कल और सुनहरे भविष्य की उम्मीद बन गया है। भले ही माओवाद का काला साया इन गांवों से छंट गया हो, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की दरकार अब भी बनी हुई है। 

अब तेजी से घुमेगा विकास का पहिया 

बोटेर और उसके आसपास के गांवों को आज भी पक्की सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाओं, राशन और नियमित शिक्षकों का इंतजार है। हालांकि, ग्रामीणों को पूरा भरोसा है कि सुरक्षा का माहौल बनने के बाद अब विकास का पहिया भी उनके गांवों तक तेजी से पहुंचेगा। अबूझमाड़ के इन नौ गांवों में फहराया गया तिरंगा सिर्फ एक आयोजन भर नहीं था। यह दशकों के खौफ से बाहर निकलने, शांति की ओर कदम बढ़ाने और लोकतांत्रिक व्यवस्था में ग्रामीणों के उस अटूट विश्वास की तस्वीर है, जिसे कोई भी आतंक अब डिगा नहीं सकता।
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