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Mayawati and Asaduddin Owaisi react to the hijab controversy
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Hijab Controversy: हाईकोर्ट के फैसले के बाद आमने-सामने आए मायावती और ओवैसी

Hijab Controversy: इलाहाबाद हाईकोर्ट के हिजाब संबंधी फैसले के बाद यूपी की राजनीति गरमा गई है। मायावती ने मामले को आपसी संवाद और संवेदनशीलता से सुलझाने की अपील की, जबकि असदुद्दीन ओवैसी ने फैसले को धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 26 Aug 2026, 01:00 PM · अपडेट: 09 Oct 2026, 01:08 AM
उत्तर प्रदेश
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Hijab Controversy: उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिजाब विवाद को लेकर मचा बवाल शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ताजा फैसले के बाद इस मुद्दे ने सियासी तूल पकड़ लिया है। इस पूरे घटनाक्रम में अब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का रुख सामने आया है। एक तरफ जहाँ मायावती ने शांति और संवेदनशीलता बरतने की सलाह दी है। 

दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील 

वहीं ओवैसी ने अदालत के फैसले की संवैधानिक वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने हिजाब और स्कूल यूनिफॉर्म से जुड़े इस संवेदनशील मामले में दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। उनका कहना है कि महिलाओं के सम्मान, आत्म-सम्मान और अस्मिता से जुड़े मुद्दों को बेहद संवेदनशीलता से निपटाया जाना चाहिए। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के धर्मनिरपेक्ष विचारों का हवाला देते हुए मायावती ने कहा कि देश का संविधान हर नागरिक को अपने धार्मिक रीति-रिवाजों और आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता देता है।
क्या कहा उन्होंने:
  • आपसी संवाद ज़रूरी: स्कूलों में ड्रेस कोड, पर्दा या हिजाब जैसे मुद्दों को अदालत का दरवाजा खटखटाने के बजाय स्कूल प्रशासन, अभिभावक और शासन को आपस में बैठकर सुलझाना चाहिए।

  • संकीर्ण राजनीति पर रोक: ऐसे मामलों को तूल देने से सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होता है और संकीर्ण राजनीति करने वालों को मौका मिल जाता है।

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    फैसले से असहमत, यह मौलिक अधिकारों का हनन: ओवैसी

    दूसरी ओर, हैदराबाद के दारुस्सलाम स्थित पार्टी मुख्यालय से बोलते हुए AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के प्रति अपनी तीखी असहमति जताई। स्कूल में हिजाब पहनकर जाने वाली छात्रा से जुड़े इस मामले पर ओवैसी ने सीधे तौर पर कानूनी और धार्मिक तर्क पेश किए:

    • संवैधानिक उल्लंघन: ओवैसी का तर्क है कि यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धर्म का आचरण और प्रचार करने का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करता है।

    • धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप: उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि इस्लाम में क्या अनिवार्य है और क्या नहीं, यह तय करने का अधिकार दूसरों के पास नहीं है। उन्होंने इस फैसले को धार्मिक स्वतंत्रता पर चोट करार दिया।

    बयानबाजी तेज, बताया धार्मिक पहचान का मुद्दा

    इस पूरे घटनाक्रम के बाद राज्य में राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है, जहाँ एक पक्ष इसे कानूनी व्यवस्था और स्कूल अनुशासन से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे नागरिक अधिकारों और धार्मिक पहचान का मुद्दा बता रहा है।

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