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कृषि विभाग : किसानों को धान की जगह दलहन खेती करने की सलाह

कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र, महासमुंद ने किसानों से खरीफ मौसम में धान के स्थान पर उपयुक्त क्षेत्रों में दलहन फसलों की खेती बढ़ाने की अपील की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे उत्पादन लागत कम होगी, मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलेगा।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 08 Jul 2026, 10:57 AM · अपडेट: 10 Sep 2026, 08:52 AM
महासमुंद
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
जिले में कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ एवं आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से किसानों से खरीफ मौसम में दलहन फसलों का रकबा बढ़ाने की अपील की गई है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार लगातार धान की खेती करने से मृदा में पोषक तत्वों का असंतुलन, कार्बनिक पदार्थों की कमी तथा जल की अत्यधिक खपत जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसी स्थिति में फसल विविधीकरण अपनाते हुए धान के उच्चहन स्थान पर उपयुक्त क्षेत्रों में अरहर, उड़द, मूंग एवं अन्य दलहन फसलों की खेती किसानों के लिए अधिक लाभकारी सिद्ध हो सकती है।
दलहन फसलें वातावरण की नाइट्रोजन को जैविक रूप से स्थिर कर मिट्टी में उपलब्ध कराती हैं, जिससे अगली फसल के लिए 30 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक नत्रजन की बचत हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, मृदा की उर्वराशक्ति बढ़ती है तथा उत्पादन लागत में कमी आती है। साथ ही दलहन फसलों के अवशेष मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाकर उसकी संरचना, जलधारण क्षमता एवं सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में सुधार करते हैं।

धान की जगह दलहन की खेती अपनाने की सलाह

कृषि विज्ञान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को दलहन फसलों की बुवाई के समय राइजोबियम, फास्फेट घुलनशील जीवाणु की मात्रा 1 मि.ग्रा. प्रति किलोग्राम बीज से जैव उर्वरकों एवं जैव फफूंद नाशी ट्राइकोडर्मा का 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से बीजोपचार करने की सलाह दी जाती है। जैव उर्वरकों के उपयोग से पौधों की जड़ों का विकास बेहतर होता है, पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है, किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि वे संतुलित उर्वरक प्रबंधन, मृदा परीक्षण के आधार पर पोषक तत्वों का उपयोग, फसल चक्र तथा जैव उर्वरकों को अपनाकर दीर्घकालीन उत्पादकता बनाए रखें। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि जहां संभव हो वहां कम उत्पादक अथवा वर्षा पर निर्भर धान क्षेत्र के स्थान पर अरहर, उड़द, मूंग एवं अन्य उपयुक्त दलहनी फसलों की खेती अपनाएं। इससे उत्पादन लागत में कमी आएगी तथा बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त होगा।

दलहन खेती से किसानों को मिलेगा अधिक लाभ 

वर्तमान मौसम में खरपतवार एवं कीट-रोग प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देना आवश्यक है। बुवाई के लगभग 20-25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई कर खेत को खरपतवार मुक्त रखें। दलहनी फसलों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ये मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन जोड़ती हैं। सामान्यतः दलहनी फसलें 40-100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक जैविक नाइट्रोजन स्थिर कर सकती हैं, जिसका लाभ अगली फसल को भी मिलता है। इसके साथ ही मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है, सूक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि होती है तथा भूमि की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहती है। यही कारण है कि फसल विविधीकरण में दलहनी फसलों का महत्वपूर्ण स्थान है। किसानों को यह भी अवगत कराया गया है कि केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के अंतर्गत अधिसूचित दलहन एवं तिलहन फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की व्यवस्था की जाती है। पात्र किसान निर्धारित शर्तों के अनुसार अपनी उपज का विक्रय कर मूल्य संरक्षण का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

वैज्ञानिक तकनीकों से बढ़ाएं दलहन उत्पादन

कृषि विभाग एवं कृषि विज्ञान केंद्र, महासमुंद द्वारा किसानों से आग्रह किया गया है कि वे खरीफ मौसम में उपलब्ध उन्नत किस्मों, संतुलित पोषण, बीजोपचार एवं वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर दलहन उत्पादन बढ़ाएं तथा जिले को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में अपना योगदान दें। अधिक जानकारी हेतु किसान अपने निकटस्थ ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी अथवा कृषि विज्ञान केंद्र, महासमुंद से संपर्क कर सकते हैं।
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