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किसान मूंगफली की खेती करते हुए खेत में काम करते नजर आए।
किसान मूंगफली की खेती करते हुए खेत में काम करते नजर आए।
महासमुंद

महासमुंद में बदली खेती की तस्वीर : धान छोड़ मूंगफली की खेती की ओर बढ़े किसान, बढ़ी कमाई की उम्मीद

महासमुंद जिले में खरीफ सीजन के दौरान करीब 1,000 हेक्टेयर क्षेत्र में मूंगफली की खेती की जा रही है। कृषि विभाग के प्रोत्साहन से किसान धान की जगह कम पानी और कम लागत वाली फसलें अपना रहे हैं, जिससे बेहतर आय और टिकाऊ खेती की उम्मीद बढ़ी है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 18 Jul 2026, 06:30 PM · अपडेट: 10 Aug 2026, 01:54 AM
महासमुंद
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पारंपरिक खेती की तस्वीर धीरे-धीरे बदलने लगी है। खरीफ सीजन में सिर्फ धान पर निर्भर रहने के बजाय अब यहाँ के किसान तेजी से वैकल्पिक और अधिक मुनाफा देने वाली फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं। कृषि विभाग की लगातार समझाइश और प्रोत्साहन का असर अब जमीनी स्तर पर दिखने लगा है, जिसके चलते इस बार जिले के करीब 1,000 हेक्टेयर क्षेत्र में मूंगफली की बुवाई की गई है। विभाग का मानना है कि यह कदम न सिर्फ किसानों की जेब मजबूत करेगा, बल्कि गिरते भूजल स्तर को सुधारने और फसल विविधीकरण (क्रॉप डायवर्सिफिकेशन) में भी बड़ा गेमचेंजर साबित होगा।

सरकारी योजना बनी मददगार, इन किसानों ने पेश की मिसाल 

कृषि उपसंचालक श्री एफ. आर. कश्यप से मिली जानकारी के मुताबिक, सरायपाली विकासखंड के ग्राम बोंदानवापाली में इस बदलाव की एक खूबसूरत तस्वीर सामने आई है। यहाँ के दो प्रगतिशील किसानों—श्री फागू लाल कैवर्त और श्री नंदकुमार कैवर्त—ने पारंपरिक लीक से हटकर कुछ नया करने का फैसला किया। दोनों ही किसानों ने राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन (National Mission on Edible Oils) का लाभ उठाते हुए इस बार धान की जगह मूंगफली को चुना। उन्होंने बीते 1 जुलाई को अपने-अपने खेतों में (0.40-0.40 हेक्टेयर) मूंगफली की बोनी की थी। 
                           धान छोड़ मूंगफली की खेती, किसानों को बेहतर मुनाफे की उम्मीद

कम पानी, कम लागत और दोगुना उम्मीद 

अपनी आपबीती और अनुभव साझा करते हुए किसान फागू लाल और नंदकुमार बताते हैं कि धान की फसल में पानी की खपत बहुत ज्यादा होती है, जिससे लागत बढ़ जाती है। इसके मुकाबले मूंगफली की खेती में न के बराबर पानी की जरूरत पड़ती है। लागत कम होने की वजह से इसमें मुनाफे का मार्जिन काफी बेहतर रहता है। उन्होंने बताया कि कृषि विभाग के फील्ड स्टाफ ने उन्हें वैज्ञानिक तौर-तरीकों और सही समय पर बुवाई की तकनीकी जानकारी दी, जिससे इस बार बंपर पैदावार की उम्मीद है।

मिट्टी की सेहत भी सुधरेगी 

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि महासमुंद में अब धीरे-धीरे दलहन (दालें) और तिलहन (तेल वाली फसलें) का रकबा बढ़ रहा है। मूंगफली जैसी फसलें सिर्फ आर्थिक रूप से ही फायदेमंद नहीं हैं, बल्कि ये वैज्ञानिक रूप से मिट्टी की उर्वरता (नाइट्रोजन फिक्सेशन) को बढ़ाती हैं। यानी कम पानी में जमीन की सेहत भी सुधरती है और किसान को कम लागत में ज्यादा दाम भी मिलते हैं। 

बदलाव की बयार 

बोंदानवापाली के इन दोनों किसानों की सफलता को देखकर अब आस-पास के गाँवों के दूसरे किसान भी मूंगफली की खेती में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। अगर यह ट्रेंड आगे बढ़ता है, तो आने वाले समय में यहाँ की खेती न सिर्फ अधिक मुनाफे वाली बनेगी, बल्कि बदलती जलवायु के खतरों से भी सुरक्षित रहेगी।
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