Mahasamund News: पुरुषोत्तम कौशिक की 96वीं जयंती पर संगोष्ठी, साथियों ने साझा किए संस्मरण
Mahasamund News: शांत्रीबाई कॉलेज परिसर में जुटे समाजसेवी और समाजवादी विचारधारा से जुड़े लोग, वक्ताओं ने कहा—कौशिक जी का जीवन आज भी सामाजिक संघर्ष और जनसेवा की प्रेरणा
प्रकाशित: 24 Sep 2026, 08:39 PM· 6 मिनट पढ़ने का समय
महासमुंद
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Mahasamund News: समाज सेवा और राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रहे वरिष्ठ नेता एवं समाजवादी विचारक स्वर्गीय पुरुषोत्तम कौशिक की 96वीं जयंती के अवसर पर 24 दिसंबर 2026 को महासमुंद के शांत्रीबाई कॉलेज परिसर में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में समाजसेवियों और उनके साथ काम कर चुके लोगों ने स्वर्गीय कौशिक से जुड़ी अपनी यादें साझा कीं और उनके विचारों, आदर्शों तथा समाज सेवा के प्रति उनके दृष्टिकोण पर चर्चा की।
पुरुषोत्तम कौशिक का राजनीतिक और सामाजिक जीवन किसान, ग्रामीण समाज तथा समाजवादी आंदोलन से जुड़े मुद्दों के साथ रहा। उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में भी उनके किसान आंदोलन और समाजवादी विचारधारा से जुड़े योगदान का उल्लेख मिलता है। वे महासमुंद से विधायक रहे और 1977 में रायपुर से लोकसभा के लिए निर्वाचित होकर केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे।
जयंती के अवसर पर आयोजित इस संगोष्ठी का केंद्र बिंदु हालांकि उनका राजनीतिक पद नहीं, बल्कि उनका जीवन, उनके विचार और कार्यकर्ताओं तथा आम लोगों के साथ उनका व्यवहार रहा।
स्व . पुरुषोत्तम कौशिक की 96वीं जयंती जब जेल में कार्यकर्ताओं के साथ ही भोजन करने पर अड़े कौशिक
कार्यक्रम में वरिष्ठ समाजसेवी दाऊलाल चंद्राकर ने पुरुषोत्तम कौशिक से जुड़ा एक संस्मरण साझा किया। उन्होंने बताया कि एक समय जेल में सभी कार्यकर्ताओं के भोजन में चना और गुड़ दिया जाता था। वहीं पुरुषोत्तम कौशिक के लिए अलग भोजन की व्यवस्था की जाती थी। जब कौशिक जी को इस बात की जानकारी मिली कि उनके साथ मौजूद कार्यकर्ता गुड़ और चना खा रहे हैं, तो उन्होंने भी वही भोजन देने की मांग की।
कार्यकर्ताओं ने उन्हें बताया कि उनके लिए अलग भोजन की व्यवस्था की गई है। इस पर कौशिक जी ने कहा कि जो कार्यकर्ता खाएंगे, पुरुषोत्तम कौशिक भी वही खाएगा। दाऊलाल चंद्राकर ने कहा कि इस घटना से कौशिक जी के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। वे अपने और कार्यकर्ताओं के बीच किसी तरह का भेद नहीं मानते थे। इसी वजह से वे कार्यकर्ताओं को अक्सर “साथी”कहकर संबोधित करते थे। उनके लिए समाज सेवा का मतलब केवल किसी पद पर रहकर काम करना नहीं था, बल्कि साथ चलने वाले लोगों के साथ समानता का व्यवहार करना भी था।
कौशिक जी स्वयं में एक इंस्टीट्यूशन के समान थे
समाजसेवी मदन देवांगन ने भी पुरुषोत्तम कौशिक से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि कौशिक जी स्वयं में एक इंस्टीट्यूशन के समान थे। उन्होंने बताया कि कौशिक जी का एक संदेश था कि “प्रशासन से डरोगे तो लोगों की मदद नहीं कर पाओगे।” मदन देवांगन के अनुसार, कौशिक जी की इसी सोच से प्रेरित होकर उन्होंने भी समाज सेवा के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शुरू किया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि कौशिक का समाज सेवा के प्रति दृष्टिकोण केवल भाषणों तक सीमित नहीं था। वे लोगों की समस्याओं को समझने और उनके लिए संघर्ष करने को सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा मानते थे।
किसानों के धान को दूसरे राज्य में बेचने के अधिकार के लिए पदयात्रा का संस्मरण
कार्यक्रम में सुखी राम ने पुरुषोत्तम कौशिक के किसान हित से जुड़े योगदानों की चर्चा की। उन्होंने बताया कि कौशिक जी ने महासमुंद की जोक नदी से महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित बाग नदी तक पदयात्रा की थी। यह यात्रा किसानों को उनके धान को राज्य के बाहर बेचने का अधिकार दिलाने की मांग से जुड़ी थी। इस संस्मरण के जरिए उन्होंने बताया कि किसानों से जुड़े मुद्दे कौशिक जी के लिए केवल राजनीतिक मुद्दे नहीं थे, बल्कि वे उन्हें किसानों के अधिकार और आजीविका से जुड़ा विषय मानते थे। कौशिक के सार्वजनिक जीवन पर उपलब्ध लेखों में भी किसान, किसानी और गांव की आवाज को उनकी प्रमुख प्राथमिकताओं में बताया गया है।
100वें जन्मदिवस पर समाजवादी मेला लगाने का प्रस्ताव
कार्यक्रम के दौरान चंद्रहास चंद्राकर एवं प्रमोद तिवारी ने स्व. पुरुषोत्तम कौशिक की 100वीं जयंती को विशेष रूप से आयोजित करने की पहल का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि कौशिक जी के 100वें जन्मदिवस पर “समाजवादी मेला” आयोजित किया जाना चाहिए। इसमें देशभर के समाजवादी विचारधारा से जुड़े लोगों को एकत्रित किया जाए और पुरुषोत्तम कौशिक के विचारों, आदर्शों तथा उनके सामाजिक एवं राजनीतिक योगदान पर विमर्श किया जाए।
उन्होंने कहा कि ऐसी पहल के जरिए नई पीढ़ी तक कौशिक जी के विचारों और उनके जीवन संघर्ष को पहुंचाया जा सकता है। गौरतलब है कि पुरुषोत्तम कौशिक की स्मृति में पहले भी कार्यक्रम आयोजित करने और उनके जीवन एवं संसदीय कार्यों से जुड़े संस्मरणों को संकलित करने की पहल हो चुकी है। 2023 में गठित पुरुषोत्तम कौशिक स्मृति समिति ने उनकी स्मृतियों पर आधारित स्मृति ग्रंथ के प्रकाशन और नियमित कार्यक्रम आयोजित करने की योजना भी बनाई थी।
पद से ज्यादा महत्वपूर्ण रहे विचार
संगोष्ठी में वक्ताओं ने पुरुषोत्तम कौशिक के राजनीतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख करते हुए कहा कि विधायक, सांसद और केंद्रीय मंत्री जैसे पदों पर रहने के बावजूद उनकी पहचान केवल राजनीतिक पदों तक सीमित नहीं रही। सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार कौशिक 1972 से 1977 तक महासमुंद विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। 1977 में वे रायपुर से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और केंद्र में पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन तथा बाद में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे सक्रिय राजनीति से बाहर रहने के दौरान भी सामाजिक और किसान मुद्दों से जुड़े रहे। उनके साथियों के संस्मरणों में भी समाजवादी आंदोलन को एकजुट करने और किसानों के सवालों को उठाने की उनकी चिंता का उल्लेख मिलता है।
नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत
जयंती समारोह में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आज के दौर में ऐसे सामाजिक और राजनीतिक व्यक्तित्वों के जीवन से जुड़े संस्मरणों को संरक्षित करने की आवश्यकता है। संगोष्ठी में साझा किए गए संस्मरणों में कहीं जेल में कार्यकर्ताओं के साथ समान भोजन करने वाला नेता नजर आया तो कहीं किसानों के मुद्दे को लेकर लंबी पदयात्रा करने वाला जनप्रतिनिधि। वहीं उनके साथियों ने उन्हें ऐसा व्यक्ति बताया, जिसने सामाजिक कार्यों में सक्रिय लोगों को आगे बढ़कर काम करने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम में यह विचार भी सामने आया कि पुरुषोत्तम कौशिक के जीवन और विचारों को केवल जयंती या पुण्यतिथि तक सीमित रखने के बजाय युवाओं और नई पीढ़ी के बीच चर्चा का विषय बनाया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से उनके 100वें जन्मदिवस पर समाजवादी मेला आयोजित करने का प्रस्ताव भी सामने आया, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों और समाजवादी विचारधारा से जुड़े लोगों को एक मंच पर लाकर उनके विचारों और योगदान पर व्यापक विमर्श करने की बात कही गई। संगोष्ठी में साझा किए गए संस्मरणों ने यह संदेश दिया कि पुरुषोत्तम कौशिक की स्मृति केवल उनके राजनीतिक जीवन से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ समान व्यवहार, किसान हितों के लिए संघर्ष और समाज सेवा के प्रति उनके दृष्टिकोण से भी जुड़ी हुई है।