Women Empowerment: कभी त्योहारों तक सीमित रहने वाली मिट्टी की कारीगरी आज महासमुंद की कुम्हार समाज की महिलाओं के लिए आजीविका का मजबूत जरिया बन रही है। वार्ड क्रमांक 23 की इन महिलाओं ने आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और आपसी सहयोग के दम पर अपने पारंपरिक हुनर को नई पहचान दी है। कभी बाजार की कमी और आर्थिक परेशानियों से जूझने वाले इन परिवारों के मिट्टी के उत्पाद अब महासमुंद से निकलकर रायपुर के हाट बाजारों और सरकारी मेलों तक पहुंच रहे हैं।
पारंपरिक हुनर को बचाने की पहल से बदली तस्वीर
कुम्हार समाज के परिवार पीढ़ियों से मिट्टी के दीपक और देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते रहे हैं। लेकिन स्टील और प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल से मिट्टी के बर्तनों की मांग प्रभावित हुई। वहीं, पारंपरिक उत्पादों की बिक्री कुछ त्योहारों तक सीमित रहने और स्थानीय बाजार में अवसर कम होने से परिवारों की आजीविका पर भी असर पड़ा। इसी स्थिति को देखते हुए सामाजिक संस्था उन्नयन जन विकास समिति ने समुदाय की महिलाओं से संपर्क कर उनकी समस्याओं को समझने और उन्हें आजीविका के बेहतर अवसरों से जोड़ने की पहल की। संस्था के कार्यकर्ताओं ने महिलाओं के साथ लगातार संवाद किया और उन्हें समूह बनाकर एक-दूसरे का सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया।
स्वयं सहायता समूह से मजबूत हुआ आपसी सहयोग
इस पहल के तहत सबसे पहले देविका महिला स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया, जिसमें 10 महिलाएं शामिल हुईं। समूह का बैंक खाता बैंक ऑफ बड़ौदा, महासमुंद में खोला गया। सभी सदस्य हर महीने 100 रुपये की बचत करने लगीं। नियमित बैठकों से महिलाओं के बीच आपसी विश्वास बढ़ा और अपने पारंपरिक काम को आगे बढ़ाने की दिशा में सामूहिक प्रयास शुरू हुए। समूह की महिलाओं ने अपने हुनर को निखारने और मिट्टी के उत्पादों को नए तरीके से तैयार करने के लिए प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता की जरूरत बताई। इसके बाद संस्था के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ शासन के माटी कला बोर्ड से उनका जुड़ाव कराया गया।
एक समूह से जुड़े करीब 40 कुम्हार परिवार
देविका महिला स्वयं सहायता समूह के प्रयासों को देखकर अनीता प्रजापति ने आसपास की अन्य कुम्हार महिलाओं को भी इस काम से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद लक्ष्मी नारायण, महाप्रभु और गायत्री महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन हुआ। इस तरह करीब 40 कुम्हार परिवारों की महिलाएं अपने पारंपरिक हुनर को आगे बढ़ाने और परिवार की आय मजबूत करने के प्रयास में जुट गईं। समूह के माध्यम से महिलाएं न केवल मिट्टी के उत्पाद तैयार कर रही हैं, बल्कि उनकी बिक्री और नियमित बचत पर भी ध्यान दे रही हैं।प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना से मिला आर्थिक सहारा
संस्था के समन्वय और मार्गदर्शन से देविका महिला स्वयं सहायता समूह को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत एक लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ। इस आर्थिक सहायता से समूह अपने पारंपरिक काम को लघु उद्योग के रूप में आगे बढ़ाने और बड़े बाजारों तक उत्पाद पहुंचाने की दिशा में काम कर रहा है। समूह की सदस्य अनीता प्रजापति बताती हैं कि दीपावली के अवसर पर वह लगभग एक लाख दीपक बेच चुकी हैं। उनके अनुसार, अब उनके बनाए मिट्टी के उत्पादों की मांग पहले से काफी बढ़ी है। इससे महिलाओं को अपने हुनर के जरिए आय अर्जित करने और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का अवसर मिला है।
परंपरा के साथ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
महासमुंद के वार्ड क्रमांक 23 की कुम्हार समाज की महिलाओं की यह पहल बताती है कि पारंपरिक हुनर को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़कर आजीविका के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं। महिलाओं की मेहनत, उन्नयन जन विकास समिति के कार्यकर्ताओं के निरंतर सहयोग और माटी कला बोर्ड से मिले प्रशिक्षण ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मिट्टी से दीपक और मूर्तियां बनाने वाली ये महिलाएं अब अपने पारंपरिक पेशे को नई पहचान देने के साथ आत्मनिर्भरता की ओर भी कदम बढ़ा रही हैं।







