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डॉ. बेद लाल साहू ने व्यक्त चिंता
डॉ. बेद लाल साहू ने व्यक्त चिंता
रायपुर संभाग

नीट का संकट : केवल पुनर्परीक्षा समाधान नहीं, व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की दरकार

NEET-2026 को लेकर देशभर में फैली अनिश्चितता और परीक्षा रद्द होने की आशंकाओं पर डॉ. बेद लाल साहू ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाएं युवाओं के भविष्य और व्यवस्था पर विश्वास का आधार होती हैं, लेकिन प्रशासनिक और तकनीकी चूकों ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्रकाशित: 25 May 2026, 06:09 PM · अपडेट: 13 Jun 2026, 03:11 PM
आरंग
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-2026) को लेकर देश भर में फैली अनिश्चितता और रद्दीकरण की आशंकाओं ने लाखों छात्र-छात्राओं और उनके परिवारों को गहरी मानसिक चिंता में डाल दिया है। इस संवेदनशील विषय पर आरंग विकासखंड के ग्राम रीवां स्थित महात्मा गांधी शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के रसायन शास्त्र व्याख्याता डॉ. बेद लाल साहू ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। 

उनका मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल दाखिले का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये युवाओं के भविष्य, कड़े परिश्रम और देश की पूरी व्यवस्था पर उनके विश्वास का सबसे बड़ा आधार होती हैं।

संकट की जड़ें और सुरक्षा का जटिल नेटवर्क

डॉ. साहू के अनुसार, परीक्षा प्रणाली में यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि यह समय रहते प्रशासनिक और तकनीकी कमियों को दूर न करने का परिणाम है। आज के डिजिटल युग में परीक्षा केवल कागज-कलम का पारंपरिक खेल नहीं रह गई है। यह सूचना, सुरक्षा और नियंत्रण के एक अत्यंत संवेदनशील नेटवर्क से जुड़ी है। प्रश्नपत्र के निर्माण, उसकी गोपनीयता, लॉजिस्टिक ट्रांसपोर्टेशन, परीक्षा केंद्रों की सख्त निगरानी, तकनीकी सत्यापन और ओएमआर (OMR) शीट की सुरक्षित हैंडलिंग के हर स्तर पर अभेद्य सुरक्षा अनिवार्य है। इस पूरी कड़ी में एक भी चूक पूरी व्यवस्था को संदिग्ध बना देती है।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और मानसिक दबाव

इस संकट का सबसे दुखद पहलू इसका सामाजिक-आर्थिक असर है। शिक्षा का उद्देश्य समाज में समानता लाना है, लेकिन जब परीक्षा की शुचिता भंग होती है, तो सबसे बड़ा आघात ग्रामीण क्षेत्रों, निम्न-मध्यम वर्ग और छोटे शहरों के उन होनहार युवाओं पर लगता है जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ना चाहते हैं। साधन-संपन्न लोग व्यवस्था की कमियों का फायदा उठा लेते हैं, जबकि ईमानदार छात्र ठगा रह जाता है। यह अनिश्चितता छात्रों को अवसाद और हताश की ओर धकेल रही है।

सुधार के चार महत्वपूर्ण कदम

व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए डॉ. साहू ने चार प्रमुख सुधारात्मक कदमों पर जोर दिया है:

  1. शीर्ष स्तर पर जवाबदेही: निचले स्तर पर कार्रवाई के बजाय परीक्षा आयोजक संस्था, संबंधित मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।

  2. पारदर्शी डिजिटल रिकॉर्ड: प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परिणाम तक हर चरण का स्वतंत्र डिजिटल ऑडिट हो, जिसमें नियंत्रण का विकेंद्रीकरण और निगरानी का केंद्रीकरण किया जाए।

  3. सीधा और पारदर्शी संवाद: अफवाहों को रोकने के लिए परीक्षा संस्थाएं छात्रों के साथ सीधा और आधिकारिक संवाद स्थापित करें।

  4. कठोर दंड की व्यवस्था: पेपर लीक और जालसाजी करने वालों के खिलाफ त्वरित और ऐसी कठोर कार्रवाई हो जो भविष्य के लिए मिसाल बने।

क्या पुनर्परीक्षा (Re-Exam) ही समाधान है?

'क्या पुनर्परीक्षा से समस्या हल हो जाएगी?' इस यक्ष प्रश्न पर डॉ. साहू का स्पष्ट कहना है कि पहली नजर में यह पीड़ित छात्रों के लिए न्यायसंगत लग सकता है, लेकिन बिना बुनियादी प्रशासनिक सुधारों और जवाबदेही तय किए दोबारा परीक्षा कराना किसी स्थायी समाधान की गारंटी नहीं है। ऐसा करना केवल पुराने संदेहों की एक नई पुनरावृत्ति मात्र बनकर रह जाएगा।

अब समय आ गया है कि इस संकट को महज एक प्रशासनिक घटना मानकर भुलाने के बजाय एक गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जाए। खोखली औपचारिक घोषणाओं के भरोसे देश की एक पूरी पीढ़ी का भविष्य दांव पर नहीं लगाया जा सकता। सरकार की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह परीक्षा प्रणाली को केवल एक 'नियंत्रण तंत्र' न मानकर, इसे 'न्याय, विश्वास और अटूट जवाबदेही' के संस्थान के रूप में स्थापित करे।

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