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Sri Lanka Iran US tension over Iranian ships (Image Source: Keertiman Media)
Sri Lanka Iran US tension over Iranian ships (Image Source: Keertiman Media)
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Sri Lanka US relations: अमेरिका की धमकी और ईरान का साथ, वैश्विक कूटनीति के चक्रव्यूह में फिर फंसा श्रीलंका

Sri Lanka US relations: हिंद महासागर में श्रीलंका के तट के पास फंसे ईरानी जहाजों को मानवीय सहायता देने के मुद्दे पर अमेरिका और श्रीलंका के बीच तनाव बढ़ गया है। अमेरिका ने संभावित प्रतिबंधों की चेतावनी दी है, जबकि श्रीलंका के सामने मानवीय जिम्मेदारी, संप्रभुता और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 07 Oct 2026, 03:25 PM · 5 मिनट पढ़ने का समय
कोलंबो
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Sri Lanka US relations: हिंद महासागर में एक बार फिर कूटनीतिक तनाव गहराता नजर आ रहा है। इस बार केंद्र में है श्रीलंका, जो अमेरिका के कड़े रुख और ईरान के साथ अपने मानवीय संबंधों के बीच बुरी तरह से पिस रहा है। अमेरिकी प्रशासन ने श्रीलंका को चेतावनी दी है कि यदि उसने अपने समुद्री तट के निकट फंसे ईरानी जहाजों को भोजन, ईंधन और पानी जैसी बुनियादी आपूर्ति जारी रखी, तो उसे कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।

क्या है पूरा मामला? 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' के खुलासे के अनुसार, श्रीलंका के समुद्री तट के पास करीब 20 ईरानी टैंकर फंसे हुए हैं। इन जहाजों पर मौजूद क्रू मेंबर्स के लिए भोजन, पीने का पानी और जरूरी ईंधन खत्म हो रहा है। श्रीलंका मानवीय आधार पर इन्हें रसद पहुंचाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वाशिंगटन को यह रास नहीं आया। 'द डिप्लोमैट' के अनुसार, कोलंबो स्थित अमेरिकी दूतावास और हाल ही में आए अमेरिकी सैन्य व असैन्य अधिकारियों ने श्रीलंकाई प्रशासन पर दबाव बनाया है कि वह इन जहाजों की किसी भी तरह की मदद न करे। दूसरी ओर, श्रीलंका के राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र ने अमेरिका के इस कड़े रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई है। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह फंसे हुए ईरानी नागरिकों को बेसहारा छोड़ना मानवीय दृष्टिकोण से गलत है। सुरक्षा अधिकारियों ने सरकार से वाशिंगटन के समक्ष अपनी नाराजगी दर्ज कराने की सिफारिश भी की थी, लेकिन मामला सार्वजनिक होने के बाद अब कोलंबो के पास कूटनीतिक रास्ते बेहद सीमित हो गए हैं।

संप्रभुता बनाम आर्थिक मजबूरी: श्रीलंका के सामने क्या हैं चुनौतियां? 

श्रीलंका ने शुरुआत में अमेरिका की इन मांगों के सामने झुकने से परहेज किया, लेकिन हकीकत यह है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में श्रीलंका के लिए वाशिंगटन से सीधी दुश्मनी लेना आसान नहीं है। श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिथा हेराथ ने इस मुद्दे पर सरकार का रुख स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में बताया कि श्रीलंका की प्रादेशिक सीमा के बाहर कुल 47 विदेशी जहाजों में से 15 ईरानी जहाजों की पहचान की गई है। विदेश मंत्री ने कहा कि हालांकि ईरान की ओर से मदद की मांग की गई थी, लेकिन सरकार ने आधिकारिक तौर पर कोई रसद मुहैया नहीं कराई है और न ही ऐसी कोई योजना है। हेराथ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई निजी आपूर्तिकर्ता (Private Supplier) इन जहाजों को रसद दे रहा है, तो वह उनका निजी व्यापारिक निर्णय है। कंपनियों को खुद तय करना होगा कि वे अमेरिकी 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' का जोखिम उठाना चाहती हैं या नहीं। वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता तुषारा रोड्रिगो ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंध वैश्विक स्तर पर लागू होते हैं, इसलिए इसे केवल श्रीलंका को निशाना बनाकर दी गई धमकी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अमेरिका से बिगाड़ क्यों नहीं सकता श्रीलंका?

श्रीलंका के आर्थिक आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि वह पश्चिमी देशों पर कितना निर्भर है:

  • निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी: श्रीलंका एक्सपोर्ट डेवलपमेंट बोर्ड के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, श्रीलंका के कुल सामान के निर्यात में अकेले अमेरिका का हिस्सा लगभग 22 प्रतिशत है।

  • यूरोपीय बाजार: यूरोपीय संघ (EU) की हिस्सेदारी 25.5% है, जबकि ब्रिटेन भी श्रीलंका का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है।

  • IMF लोन का सहारा: आर्थिक कड़की से जूझ रहे श्रीलंका को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से जो वित्तीय मदद मिल रही है, उसमें भी अमेरिका का समर्थन बेहद निर्णायक है।

ऐसे में यदि अमेरिका श्रीलंका पर किसी भी तरह के प्रतिबंध लगाता है, तो हाल ही में घुटनों पर आकर धीरे-धीरे संभल रहा यह द्वीप देश एक बार फिर दिवालियापन के मुहाने पर खड़ा हो सकता है।

ईरान का साथ छोड़ना भी नहीं है आसान 

एक तरफ आर्थिक तबाही का डर है, तो दूसरी तरफ अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता (Sovereignty) की रक्षा का सवाल। अगर श्रीलंका अमेरिका के दबाव में पूरी तरह पीछे हट जाता है, तो इससे दुनिया भर में यह संदेश जाएगा कि वह अपने स्वतंत्र फैसले लेने में सक्षम नहीं है। यह पहली बार नहीं है जब श्रीलंका ने अमेरिका के विरोध के बावजूद मानवीय फैसले लिए हों। इससे पहले जब मार्च में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका तट के पास ईरानी नौसैनिक जहाज 'IRIS Dena' को निशाना बनाया था, तब श्रीलंका ने अपनी जान जोखिम में डालकर बचे हुए लोगों का रेस्क्यू किया था। इसके अलावा कोलंबो ने 'IRIS Bushehr' को अपनी हिरासत में लेकर उसके 230 से ज्यादा ईरानी नौसैनिकों को सुरक्षित उनके देश वापस भेजा था। उस समय भी वाशिंगटन कोलंबो से बेहद नाराज हुआ था। लेकिन आज श्रीलंका एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है—जहाँ एक तरफ अमेरिका का आर्थिक चाबुक है, तो दूसरी तरफ एक पुराने मित्र देश के प्रति उसका मानवीय कर्तव्य। अब देखना यह होगा कि कोलंबो अपनी स्वतंत्रता की रक्षा कैसे करता है।

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