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देशी धान के साथ किसान भवानी पंडा
देशी धान के साथ किसान भवानी पंडा
रायगढ़

अनूठी पहल : आधे एकड़ में संजोईं देशी धान की 76 किस्में, रायगढ़ के किसान की राष्ट्रीय पहचान

रायगढ़ के खैरबहार गांव के किसान भवानी पंडा ने आधे एकड़ खेत में देशी धान की 76 दुर्लभ किस्मों का संरक्षण कर मिसाल पेश की है। उनके प्रयास को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, जबकि जैविक खेती और पारंपरिक बीजों के संरक्षण के लिए वे अन्य किसानों को भी प्रेरित कर रहे हैं।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 29 Jun 2026, 10:23 AM · अपडेट: 03 Oct 2026, 04:24 AM
रायगढ़
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
रायगढ़ जिले के खैरबहार गांव के किसान भवानी पंडा ने यह साबित कर दिया है कि खेती केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी पारंपरिक कृषि विरासत को संजोने का भी माध्यम बन सकती है। ऐसे दौर में जब अधिकतर किसान हाइब्रिड बीजों और रासायनिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं, भवानी पंडा ने देशी धान की विलुप्त होती किस्मों को संरक्षित करने का संकल्प लिया। महज तीन वर्षों में उनका यह प्रयास स्थानीय स्तर से निकलकर राष्ट्रीय पहचान हासिल करने की दिशा में पहुंच चुका है। 
वर्तमान में भवानी पंडा अपने आधे एकड़ खेत में देशी धान की 76 अलग-अलग किस्मों का संरक्षण कर रहे हैं। यह संग्रह केवल खेती का प्रयोग नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पारंपरिक बीजों को सुरक्षित रखने की एक महत्वपूर्ण पहल है। उनके खेत में मूलामंजी, जवाफूल समेत कई ऐसी देशी किस्में मौजूद हैं, जिनकी मांग आज भी किसानों के बीच बनी हुई है। 

स्वास्थ्य और खेती के बीच संबंध को समझने की कोशिश 

भवानी बताते हैं कि इस अभियान की शुरुआत उनके परिवार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बाद हुई। उन्होंने भोजन, स्वास्थ्य और खेती के बीच संबंध को समझने की कोशिश की, जिससे उनका ध्यान जैविक खेती और पारंपरिक धान की ओर गया। इसके बाद उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों से देशी धान के बीज जुटाने शुरू किए। शुरुआत कुछ सीमित किस्मों से हुई, लेकिन हर फसल सीजन के साथ उनका संग्रह बढ़ता गया और आज यह 76 किस्मों तक पहुंच चुका है। देशी धान के संरक्षण के साथ-साथ भवानी इन बीजों को अन्य किसानों तक भी पहुंचाने का काम कर रहे हैं। रायगढ़, जांजगीर-चांपा, सरगुजा सहित आसपास के कई जिलों के किसान उनके खेत पर बीज लेने आते हैं। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के बलिया और ओडिशा के कटक से भी किसान उनके प्रयास को देखने पहुंच चुके हैं। वे अनेक किसानों को निशुल्क बीज उपलब्ध कराकर देशी धान की खेती को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।

देशी धान की 76 किस्मों
आधे एकड़ की पहल ने दिलाई राष्ट्रीय स्तर की पहचान

उनके इस योगदान के लिए हाल ही में रायपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्हें सम्मानित भी किया गया। सम्मान मिलने के बाद भवानी ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से संपर्क कर अपने संग्रह की जानकारी साझा की। वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में उन्होंने देशी धान की 28 किस्मों के लगभग 600-600 ग्राम नमूने राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण के लिए दिल्ली भेजे। जांच के बाद इनमें से 21 किस्मों को राष्ट्रीय चयन प्रक्रिया में शामिल किया गया, जबकि सात किस्में पहले से पंजीकृत होने के कारण इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सकीं। 
भवानी पंडा जैविक खेती को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना बीज संरक्षण को। उनका मानना है कि पारंपरिक धान की बेहतर पैदावार के लिए मिट्टी का स्वस्थ होना जरूरी है। यही वजह है कि वे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से दूरी बनाकर प्राकृतिक जैविक सामग्री का उपयोग करते हैं। खेत में जैविक पदार्थों को सड़ाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है और उसी के बाद धान की खेती की जाती है। आज आधे एकड़ खेत से शुरू हुई यह पहल खैरबहार गांव की नई पहचान बन चुकी है। सीमित संसाधनों के बावजूद भवानी पंडा ने जिस समर्पण के साथ देशी धान की 76 किस्मों का संरक्षण किया है, वह न केवल पारंपरिक कृषि विरासत को बचाने की दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण है, बल्कि जैविक खेती और जैव विविधता संरक्षण के महत्व को भी नई पहचान दे रहा है।
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