UP Politics: उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान में विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक जोड़-तोड़ का खेल तेज हो गया है। तमाम दल अपनी-अपनी गोटियां सेट करने और पुराने साथियों को साधने में जुटे हैं। इसी बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक ऐसा सियासी दांव चला है, जिसने मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) को कशमकश में डाल दिया है। कानपुर के पास एक जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता में आने से रोकने के लिए विपक्षी दलों के साथ हाथ मिलाने की खुली पेशकश की है। ओवैसी ने साफ कहा कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में भाजपा की दोबारा सरकार बनने से रोकने के लिए किसी भी समान विचारधारा वाले दल के साथ काम करने को तैयार है।
अखिलेश यादव के सामने क्या है चुनौती?
ओवैसी के इस ऑफर ने सबसे ज्यादा हलचल समाजवादी पार्टी के खेमे में मचाई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस बार 'PDA' (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे में अगर अखिलेश, ओवैसी को अपने साथ लाते हैं, तो भाजपा इसे सीधे तौर पर 'तुष्टिकरण' और 'कट्टरपंथी गोलबंदी' के रूप में भुनाने की कोशिश करेगी। इस ध्रुवीकरण का सीधा नुकसान सपा के पारंपरिक और गैर-मुस्लिम वोटों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि ओवैसी का यह ऑफर अखिलेश के लिए एक सियासी धर्मसंकट बन गया है।
बिहार चुनाव की कड़वाहट और चेतावनी
अपनी सभा के दौरान ओवैसी ने बिहार विधानसभा चुनाव के दौर को भी याद किया। उन्होंने कहा, "बिहार में हमने सिर्फ 6 सीटें मांगी थीं, लेकिन विपक्ष इसके लिए भी राजी नहीं हुआ और उल्टा हम पर तमाम तरह के मनगढंत आरोप लगाए गए।" ओवैसी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर वाकई भाजपा को रोकना प्राथमिकता है, तो विपक्षी दलों को आगे आकर उनसे बात करनी होगी। उन्होंने साफ किया कि वह बातचीत के लिए 2 अक्टूबर तक का इंतजार करेंगे।क्या बिहार जैसी भूल दोहराएगी सपा?
फिलहाल ओवैसी ने गठबंधन का पासा फेंककर गेंद अखिलेश यादव के पाले में डाल दी है। बिहार में विपक्षी गठबंधन की इस अनदेखी के कारण वोटों का जो बिखराव हुआ था, उसका खामियाजा पूरे विपक्ष को भुगतना पड़ा था। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव ओवैसी की इस पेशकश को स्वीकार कर कोई नया राजनीतिक समीकरण बनाते हैं, या फिर बिहार की तरह इस बार भी ओवैसी से दूरी बनाकर ही चुनावी मैदान में उतरते हैं। आने वाले कुछ दिन यूपी की राजनीति का रुख तय करने वाले साबित होंगे।












