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Balbir Kaur death case in Durg (Image Source: Social Media)
Balbir Kaur death case in Durg (Image Source: Social Media)
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Durg Hospital Case: महिला अधिवक्ता की मौत पर हाईटेक अस्पताल में हंगामा, एक करोड़ मुआवजे की मांग

Durg Hospital Case: हाईटेक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में महिला अधिवक्ता बलबीर कौर की इलाज के दौरान मौत के बाद विवाद बढ़ गया है। परिजनों और अधिवक्ता संघ ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए एक करोड़ रुपए मुआवजे और जिम्मेदार डॉक्टरों पर कार्रवाई की मांग की है।

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प्रकाशित: 06 Nov 2026, 05:04 PM · 3 मिनट पढ़ने का समय
भिलाई
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
Durg Hospital Case: स्मृति नगर स्थित हाईटेक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में महिला अधिवक्ता बलबीर कौर की इलाज के दौरान हुई मौत के बाद मामला तूल पकड़ता जा रहा है। घटना से नाराज परिजनों और दुर्ग जिला अधिवक्ता संघ के सदस्यों ने अस्पताल के बाहर प्रदर्शन कर प्रबंधन के खिलाफ नाराजगी जताई। परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए एक करोड़ रुपए मुआवजे और जिम्मेदार डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। 
दूसरी ओर, अस्पताल प्रबंधन ने इन आरोपों को खारिज किया है। प्रबंधन का कहना है कि मरीज की हालत बिगड़ने पर डॉक्टरों की टीम ने तत्काल उपचार शुरू किया और उन्हें बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।

कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग

दुर्ग जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष रमेश शर्मा के अनुसार, संघ की ओर से कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है। संघ ने जिला चिकित्सालय अधिकारी के माध्यम से भी मामले का परीक्षण कराने की बात कही है। अधिवक्ता संघ का कहना है कि महिला अधिवक्ता की मौत किन परिस्थितियों में हुई, इसकी जांच जरूरी है। साथ ही पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपए का मुआवजा देने और यदि जांच में लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई है।

अस्पताल प्रबंधन ने लापरवाही के आरोपों को नकारा

हाईटेक अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. नवील शर्मा ने इलाज में किसी भी तरह की लापरवाही होने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि मरीज को बचाने के लिए चिकित्सकों ने पूरी गंभीरता से उपचार किया था। एनेस्थीसिया और दवाइयों की खुराक को लेकर उठ रहे सवालों पर उन्होंने बताया कि मरीज को निर्धारित मात्रा में दवाइयां दी गई थीं। उनके मुताबिक, इस तरह की दवाइयों के इस्तेमाल के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों की जरूरत होती है और अस्पताल में प्रशिक्षित डॉक्टरों की टीम उपलब्ध है।

ऑपरेशन के दौरान बिगड़ी हालत, डॉक्टरों ने रोकी प्रक्रिया

डॉ. शर्मा के मुताबिक, महिला अधिवक्ता का ऑपरेशन शुरू हो चुका था और शुरुआत में प्रक्रिया सामान्य रूप से चल रही थी। इसी दौरान मॉनिटरिंग मशीनों में कुछ असामान्य बदलाव दिखाई दिए। स्थिति को देखते हुए एनेस्थीसिया विशेषज्ञ ने तत्काल हस्तक्षेप किया और ऑपरेशन रोक दिया। डॉक्टरों को पल्मोनरी एम्बोलिज्म की आशंका हुई। इस स्थिति में खून का थक्का फेफड़ों की रक्त नलिकाओं में फंस सकता है, जिससे मरीज की हालत अचानक गंभीर हो जाती है। अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि इसके बाद मरीज को संभालने के लिए जरूरी दवाइयां दी गईं और सीपीआर समेत आपातकालीन उपचार शुरू किया गया। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया। वेंटिलेटर पर रखने को लेकर उठे सवालों पर मेडिकल डायरेक्टर ने कहा कि उस समय मरीज की जान बचाना सबसे जरूरी था और आपात स्थिति में उपचार के लिए तत्काल निर्णय लेना पड़ता है।

सुबह फिर बिगड़ी तबीयत, उपचार के बावजूद नहीं बची जान

अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, उपचार के दौरान शाम तक मरीज का ब्लड प्रेशर सुधरने लगा था और उनकी स्थिति में कुछ सुधार भी दिखाई दिया। हालांकि, अगले दिन सुबह करीब 6 बजे उनकी हालत दोबारा गंभीर हो गई। प्रबंधन का कहना है कि खून का थक्का बनने या उसके खिसकने से फिर परेशानी हुई। आईसीयू में डॉक्टरों की टीम ने दोबारा सीपीआर और अन्य जरूरी चिकित्सकीय प्रक्रियाएं अपनाईं, लेकिन महिला अधिवक्ता को बचाया नहीं जा सका। फिलहाल इस मामले में परिजनों और अस्पताल प्रबंधन के दावे अलग-अलग हैं। अधिवक्ता संघ ने निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। जांच के बाद ही इलाज के दौरान हुई घटनाओं और लगाए गए आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
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