आखिर ऐसा क्या खास है 'महाराजा' में?
संस्पेंस के बीच में थोड़ा सा हल्का-फुल्का हास्य
दो पिताओं की एक उलझी हुई दास्तान
'महाराजा' सिर्फ एक चोरी की गुत्थी सुलझाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह दो अलग-अलग पिताओं के जीवन का एक कड़वा सच भी सामने लाती है:
महाराजा: जो अपनी पत्नी की असमय मौत के बाद अपनी छोटी सी बेटी ज्योति की अकेले दम पर परवरिश कर रहा है।
अनुराग कश्यप का किरदार: जो अपने परिवार (पत्नी और बेटी) के साथ एक अलग तरह की जिंदगी जी रहा है।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इन दोनों परिवारों की राहें एक-दूसरे से टकराती हैं और यहीं से फिल्म का असली सस्पेंस शुरू होता है।
कोरियन थ्रिलर जैसा क्लाइमैक्स: आखिरी 20 मिनट रोंगटे खड़े कर देंगे
इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका क्लाइमैक्स है। निर्देशक निथिलन ने कोरियन सिनेमा की तर्ज पर ऐसा ताना-बाना बुना है कि शुरुआत में नजर आने वाली छोटी-छोटी और गैर-जरूरी सी लगने वाली बातें, फिल्म के अंत में बहुत बड़ा रूप ले लेती हैं। फिल्म के आखिरी 20 मिनटों में जब एक-एक करके राज खुलते हैं, तो दर्शक दंग रह जाते हैं। जिस 'लक्ष्मी' को लेकर दर्शक शुरुआत से अनुमान लगा रहे होते हैं, उसका सच सामने आते ही पूरी कहानी का नजरिया ही बदल जाता है।विजय सेतुपति और अनुराग कश्यप की बेजोड़ अदाकारी
फिल्म को यादगार बनाने में विजय सेतुपति के अभिनय का बहुत बड़ा हाथ है। उन्होंने बिना किसी लाउड ड्रामे के, बेहद सादगी और गंभीरता के साथ महाराजा के दर्द को परदे पर उतारा है। दूसरी ओर, ज्यादातर निर्देशन के लिए जाने जाने वाले अनुराग कश्यप ने अपने अभिनय से हर किसी को चौंका दिया है। दोनों अभिनेताओं का आमना-सामना फिल्म का सबसे पावरफुल एलिमेंट है। फिलहाल हॉलीवुड रीमेक को लेकर आधिकारिक घोषणा का इंतजार है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि 'महाराजा' की रहस्यमयी कहानी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अगर कंटेंट में दम हो, तो सिनेमा की कोई भाषा या सीमा नहीं होती।

