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हाईकोर्ट से विनेश को मिली राहत
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विनेश फोगाट :  दिल्ली हाईकोर्ट से मिली राहत, फिर भी एशियन गेम्स पर बना संशय

भारतीय महिला पहलवान विनेश फोगाट को दिल्ली हाईकोर्ट से एशियन गेम्स चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की राहत मिल गई है, लेकिन उनका एशियन गेम्स खेलना अब भी तय नहीं माना जा रहा। विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि एशियन गेम्स के लिए भेजी गई प्रारंभिक लांग लिस्ट में उनका नाम शामिल नहीं था। ऐसे में ट्रायल जीतने के बाद भी अंतिम फैसला ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया (OCA) और खेल अधिकारियों के हाथ में रहेगा। हाईकोर्ट ने WFI की चयन नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि “मदरहुड को सजा नहीं बनाया जा सकता” और चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के निर्देश दिए।

प्रकाशित: 26 May 2026, 12:12 PM · अपडेट: 25 Jun 2026, 03:10 PM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
भारतीय महिला कुश्ती की सबसे बड़ी स्टार खिलाड़ियों में शामिल विनेश फोगाट एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार चर्चा उनके किसी पदक या जीत को लेकर नहीं, बल्कि 2026 एशियन गेम्स में उनकी संभावित वापसी और चयन विवाद को लेकर हो रही है। दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिलने के बाद अब वह एशियन गेम्स चयन ट्रायल में हिस्सा ले सकेंगी, लेकिन इसके बावजूद उनका एशियन गेम्स खेलना अभी भी पूरी तरह तय नहीं माना जा रहा है।  खेल जगत में इस पूरे मामले को सिर्फ एक खिलाड़ी के चयन विवाद के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे महिला खिलाड़ियों के अधिकार, मातृत्व अवकाश, खेल संघों की चयन नीति और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में भी माना जा रहा है। यही वजह है कि यह मामला अब खेल गलियारों से निकलकर कानूनी और सामाजिक बहस का विषय बना हुआ  है।

क्या है पूरा मामला

विवाद की शुरुआत तब हुई जब रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया ने विनेश फोगाट को एशियन गेम्स चयन प्रक्रिया में शामिल होने के लिए “अयोग्य” घोषित कर दिया। संघ का तर्क था कि विनेश ने निर्धारित घरेलू प्रतियोगिताओं और चयन मानदंडों को पूरा नहीं किया है। इसके अलावा उनकी फिटनेस, प्रतिस्पर्धी वापसी और पात्रता को लेकर भी सवाल उठाए गए।  इसके बाद विनेश फोगाट ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया और WFI के फैसले को चुनौती दी। उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि मातृत्व अवकाश और वापसी के दौरान उन्हें समान अवसर नहीं दिए जा रहे हैं। विनेश का कहना था कि उनके साथ चयन नीति के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है।

दिल्ली हाईकोर्ट से मिली राहत

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के रवैये पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि “मदरहुड को सजा नहीं बनाया जा सकता।” अदालत ने कहा कि महिला खिलाड़ियों को मातृत्व के कारण करियर में नुकसान नहीं उठाना चाहिए और खेल संघों की नीतियां संवेदनशील तथा न्यायसंगत होनी चाहिए।  हाईकोर्ट ने विनेश फोगाट को चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति दी है। साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि ट्रायल प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। कोर्ट ने ट्रायल की वीडियोग्राफी कराने और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) तथा इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन (IOA) के स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की मौजूदगी सुनिश्चित करने को कहा।  यह फैसला विनेश फोगाट के लिए बड़ी कानूनी जीत है। हालांकि अदालत की राहत के बावजूद उनकी एशियन गेम्स में जगह अभी भी पूरी तरह पक्की नहीं मानी जा रही है।

लांग लिस्ट में नाम नहीं 

इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू यह है कि एशियन गेम्स के लिए भेजी गई शुरुआती “लांग लिस्ट” में विनेश फोगाट का नाम शामिल नहीं था। यही वजह है कि मामला अब और जटिल हो गया है। सामान्य तौर पर किसी खिलाड़ी को अंतिम दल में शामिल करने से पहले उसका नाम ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया (OCA) को भेजी गई प्रारंभिक सूची में होना जरूरी है।  कि यदि किसी खिलाड़ी का नाम लांग लिस्ट में नहीं होता, तो बाद में उसे जोड़ने के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में यदि विनेश चयन ट्रायल जीत भी जाती हैं, तब भी अंतिम फैसला ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया और आयोजन समिति के स्तर पर लिया जाएगा। यही कारण है कि उनके एशियन गेम्स खेलने की गारंटी अब भी नहीं मानी जा रही। 

WFI ने नहीं दी आगे चुनौती

दिलचस्प बात यह है कि रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया ने हाईकोर्ट के फैसले को आगे चुनौती नहीं देने का फैसला किया है। इसका मतलब यह है कि विनेश अब चयन ट्रायल में उतर सकेंगी। हालांकि WFI ने यह भी स्पष्ट किया है कि ट्रायल खेलने की अनुमति और अंतिम चयन दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।  संघ का कहना है कि चयन प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय नियमों औरओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया की गाइडलाइन के तहत ही पूरी की जाएगी। यानी ट्रायल जीतने के बावजूद अंतिम मंजूरी कई स्तरों से होकर गुजर सकती है।

मातृत्व अवकाश बना राष्ट्रीय मुद्दा

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा कोर्ट की उस टिप्पणी की हो रही है जिसमें महिला खिलाड़ियों के मातृत्व अधिकारों पर जोर दिया गया। अदालत ने कहा कि गर्भावस्था और मातृत्व को किसी खिलाड़ी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने WFI की चयन नीति को “अनुचित” और “बहिष्करणकारी” तक बताया।   यह फैसला आने वाले समय में भारतीय खेल नीतियों को प्रभावित कर सकता है। महिला खिलाड़ियों के लिए मातृत्व के बाद वापसी को लेकर स्पष्ट और संवेदनशील नियम बनाने की मांग अब तेज हो सकती है।

भारतीय कुश्ती की स्टार्स हैं विनेश

विनेश फोगाट भारतीय महिला कुश्ती की सबसे सफल खिलाड़ियों में गिनी जाती हैं। उन्होंने 2014 एशियन गेम्स में कांस्य पदक और 2018 एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा था। इसके अलावा वे कॉमनवेल्थ गेम्स, विश्व चैंपियनशिप और एशियन चैंपियनशिप में भी कई पदक जीत चुकी हैं।  पेरिस ओलंपिक 2024 में भी विनेश फोगाट ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल तक का सफर तय किया था। हालांकि फाइनल से पहले वजन सीमा से मामूली ऊपर पाए जाने के कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था। यह घटना भारतीय खेल इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल रही। उस घटना के बाद विनेश ने भावुक होकर संन्यास की घोषणा कर दी थी, लेकिन बाद में उन्होंने वापसी का फैसला किया। अब माना जा रहा है कि उनका लक्ष्य 2028 लॉस एंजेलिस ओलंपिक तक सक्रिय रहना है।

खेल राजनीति और प्रशासन पर उठे सवाल

इस पूरे विवाद ने भारतीय कुश्ती प्रशासन और खेल संघों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कई पूर्व खिलाड़ियों और खेल विशेषज्ञों का मानना है कि चयन प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।  यदि देश की सबसे सफल महिला पहलवानों में शामिल खिलाड़ी को भी कोर्ट का सहारा लेना पड़ रहा है, तो यह भारतीय खेल प्रशासन के लिए गंभीर संकेत है।

ट्रायल और OCA

फिलहाल विनेश फोगाट को कोर्ट से राहत मिलने के बाद उनके समर्थकों में उत्साह जरूर बढ़ा है, लेकिन असली चुनौती अभी बाकी है। चयन ट्रायल में उनका प्रदर्शन, WFI की आगे की प्रक्रिया और सबसे अहम OCA की मंजूरी—इन सभी पर उनके एशियन गेम्स भविष्य का फैसला टिका हुआ है।  भारतीय खेल जगत की नजर अब आने वाले ट्रायल और ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है। यदि विनेश फोगाट को आखिरकार एशियन गेम्स में खेलने का मौका मिलता है, तो यह सिर्फ एक खिलाड़ी की वापसी नहीं बल्कि महिला खिलाड़ियों के अधिकारों और संघर्ष की बड़ी जीत भी मानी जाएगी।
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