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पढ़िए डॉ. नीरज गजेंद्र का लिखा विचारोत्तेजक चिंतन- मुफ्त के कंबल और नंगी होती आत्मा का सच

मुझे एक अखबार के रिसर्च को पढ़ने के बाद आया। अखबार ने बताया है कि तमिलनाडु में इस बार समर पैकेज देने की तैयारी है जिसमें 1.06 करोड़ महिलाओं के खाते में दो-दो हजार ट्रांसफर होंगे। असम में बिहू बोनस के रूप में चार-चार हजार मिलेंगे। बंगाल में लक्ष्मी भंडार और केरल में भी कुछ इसी तरह की स्कीम की चर्चा आमजन के बीच पहुंची है

डॉ. नीरज गजेंद्र
प्रकाशित: 29 Mar 2026, 06:30 PM · अपडेट: 18 Sep 2026, 03:30 AM
भारत
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

मैं आज भारत के दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ी खबरें पढ़ रहा था, तो मुझे एक कहानी का स्मरण हो आया। भले ही वह पुरानी है, पर अर्थ बिल्कुल नया है। कहानी शायद आपने भी पढ़ी-सुनी या देखी होंगी, जिसमें भेड़ों को सर्दी से बचाने के लिए जंगल के राजा ने मुफ्त में कंबल बटवाते हैं। भेड़ें खुश होकर जयघोष करने लगते हैं कि वाह! क्या दयालु राजा है। लेकिन इसी वाहवाही के शोर के बीच एक मासूम मेमने के सवाल कि इतनी ऊन आई कहां से? को सुनकर सभी भेड अपना शरीर देखते हैं और सच सामने आ जाता है। याद आया... मुझे एक अखबार के रिसर्च को पढ़ने के बाद आया। अखबार ने बताया है कि तमिलनाडु में इस बार समर पैकेज देने की तैयारी है जिसमें 1.06 करोड़ महिलाओं के खाते में दो-दो हजार ट्रांसफर होंगे। असम में बिहू बोनस के रूप में चार-चार हजार मिलेंगे। बंगाल में लक्ष्मी भंडार और केरल में भी कुछ इसी तरह की स्कीम की चर्चा आमजन के बीच पहुंची है।

स्मरण हुआ कि जंगल की वह कहानी आज गांव-शहर की सच्चाई बन चुकी है। हम भी मुफ्त के कंबलों की प्रतीक्षा में हैं। कभी योजनाओं के रूप में, कभी सब्सिडी, कभी सुविधाओं के नाम पर। हमें लगता है कि कोई राजा है जो हमारी चिंता करता है। पर हां! हमने भी नहीं सोचा है कि यह सब आएगा कहां से। जब रसोई का बजट बढ़ता है। जब बिजली-पानी महंगे होते हैं। जब रोजमर्रा की वस्तुएं हमारी पहुंच से दूर होने लगती हैं। तब कहीं न कहीं वही सवाल उठता है जो उस मेमने ने पूछा था। फर्क सिर्फ इतना है कि अब सवाल पूछने की मासूमियत कम होती जा रही है।

भारतीय परंपरा में ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत जैसी कहावतों का भी उल्लेख मिलता है, पर साथ ही ईशोपनिषद का संदेश तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा भी है, जिसमें त्याग के साथ उपभोग करने की बात कही गई है। आज हम त्याग भूलकर, उपभोग पर केंद्रित हो गए हैं। और जब कोई हमें मुफ्त में कुछ देता है, तो हम यह भूल जाते हैं कि उसका मूल्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कहीं न कहीं हम ही चुका रहे हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कर्मण्येवाधिकारस्ते, लेकिन आज की व्यवस्था हमें उल्टा सिखा रही है कि फल लो, चाहे कर्म किसी और का हो या कीमत तुम्हारे भविष्य से वसूली जाए। समझ गए न यहां हम खुद ही अपनी ऊन दे रहे हैं, और फिर उसी से बने कंबल को अनुग्रह मानकर ओढ़ रहे हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह आर्थिक या सामाजिक मुद्दा नहीं है, यह चेतना का प्रश्न है। जब व्यक्ति अपनी आत्मा से कट जाता है, तब वह बाहरी सुख-सुविधाओं में ही संतोष खोजने लगता है। कठोपनिषद में कहा गया है कि श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः यानि मनुष्य के सामने दो रास्ते होते हैं, श्रेय (कल्याण) और प्रेय (भोग) का, आज हम प्रेय को चुन रहे हैं, और श्रेय को नजरअंदाज कर रहे हैं।

मुफ्त के कंबल हमें तत्काल राहत दे सकते हैं, पर क्या वे हमारी आत्मा को ढक सकते हैं। क्या वे उस असहजता को मिटा सकते हैं, जो भीतर कहीं यह जानकर पैदा होती है कि इसकी कीमत हमने ही चुकाई है। समाज में बढ़ती यह चर्चा, कि हमारे ही घर से कहीं सब कुछ गायब तो नहीं हो रहा। दरअसल जागरूकता की पहली आहट है। यह वही क्षण है जब भेड़ें अपने शरीर को देख रही होती हैं। सवाल यह है कि क्या हम उस समझ तक पहुंचेंगे, या फिर कुछ समय बाद एक और कंबल के इंतजार में सब कुछ भूल जाएंगे। याद रखें, राजा कभी भी बिना ऊन के कंबल नहीं बनाता। और अगर बनाता है, तो समझ लीजिए कि ऊन कहीं न कहीं से हमारे बीच से ही गई है। इसलिए शायद अब समय आ गया है कि हम मेमने की तरह मासूम सवाल पूछें कि आखिर ऊन आई कहां से। क्योंकि यही सवाल हमें कंबल की सच्चाई बताएगा, और हमारी नंगी होती आत्मा को भी आईना दिखाएगा।

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