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कांग्रेस दफ्तर में मारपीट : सत्ता का मैदान जीतने छोड़नी होगी अपनों की लड़ाई

महासमुंद कांग्रेस भवन हुई मारपीट, तोड़फोड और तनाव की अंदरुनी कलह पर पढ़िए डॉ. नीरज गजेंद्र की त्वरित टिप्पणी

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 03 Apr 2026, 07:11 PM · अपडेट: 18 Sep 2026, 03:30 AM
छत्तीसगढ़
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
महासमुंद के कांग्रेस भवन में जो कुछ हुआ, वह दो नेताओं की आपसी झड़प नहीं है। यह उस बड़ी बीमारी का छोटा सा लक्षण है, जिससे आज कांग्रेस जूझ रही है। जिस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई थी। वह महंगाई, पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से आक्रोश, यह सब तो पीछे छूट गया। मंच बन गया आपसी अहंकार, असंतोष और संगठनात्मक कमजोरी का। सोचिए, जिस पार्टी को जनता के मुद्दों पर सरकार को घेरना था, वह खुद अपने ही घर में घिर गई। और वजह बनी कार्यकर्ताओं की कम उपस्थिति। यह एक साधारण टिप्पणी नहीं है, गहरी सच्चाई है कि संगठन जमीन पर कमजोर पड़ रहा है।
यह घटना कई सवाल खड़े करती है। पहला सवाल कि क्या कांग्रेस अब मुद्दों की पार्टी रह गई है या व्यक्तियों की। जब बहस विचारों पर नहीं, कौन सही और कौन बड़ा पर होने लगे, तो समझ लीजिए कि पार्टी की दिशा भटक चुकी है। दूसरा सवाल कि क्या संगठन में संवाद की जगह खत्म हो गई है। क्योंकि अगर एक साधारण टिप्पणी पर बात सीधे लात-घूंसे तक पहुंच जाए, तो इसका मतलब है कि अंदर बहुत कुछ दबा हुआ है। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस का जमीनी कैडर अब सक्रिय नहीं है।
लात घुंसों में शामिल एक कार्यकर्ता का यह कहना कि कार्यकर्ताओं से ज्यादा पत्रकार थे, अपने आप में एक संकेत है। यह एक जिले की स्थिति नहीं है, देशभर में कांग्रेस की गिरती जमीनी पकड़ का प्रतिबिंब है। अगर हम थोड़ा व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो कांग्रेस का गिरता ग्राफ कोई अचानक हुई घटना नहीं है। इसके पीछे कई कारण हैं। कांग्रेस लंबे समय से एक स्पष्ट और मजबूत नेतृत्व की तलाश में है। राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की अस्पष्टता का असर सीधे राज्यों और जिलों तक पहुंचता है। जब ऊपर दिशा स्पष्ट नहीं होती, तो नीचे भ्रम और खींचतान स्वाभाविक है।
कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी हमेशा से आंतरिक गुटबाजी रही है। महासमुंद की यह घटना उसी का एक स्थानीय रूप है। जब नेता आपस में ही एक-दूसरे को कमजोर करने में लगे हों, तो संगठन मजबूत कैसे होगा। आज भाजपा जैसे दल बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क बना चुके हैं, जबकि कांग्रेस का कार्यकर्ता कई जगहों पर निष्क्रिय या निराश नजर आता है। कार्यक्रमों में भीड़ कम होना उसी का संकेत है। महंगाई जैसे बड़े मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई थी, लेकिन वह खुद ही विवाद में दब गई। यह बताता है कि कांग्रेस अब मुद्दों को प्रभावी तरीके से जनता तक पहुंचाने में भी पिछड़ रही है। जब पार्टी के वरिष्ठ नेता ही सार्वजनिक रूप से इस तरह का व्यवहार करें, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, संस्थागत विफलता भी है।
महासमुंद की यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह इमेज क्राइसिस को और गहरा करती है। जनता पहले ही कांग्रेस को एक कमजोर और बिखरी हुई पार्टी के रूप में देखने लगी है, और ऐसे दृश्य उस धारणा को मजबूत करते हैं। यहां एक और दिलचस्प पहलू इस पूरे विवाद में पत्रकारों का जिक्र है। कार्यकर्ताओं से ज्यादा पत्रकार, यह वाक्य सिर्फ व्यंग्य नहीं, यह बताता है कि पार्टी अब इवेंट मैनेजमेंट तक सिमटती जा रही है, जबकि असली ताकत यानी कार्यकर्ता गायब हो रहे हैं। अगर कांग्रेस को सच में अपने गिरते ग्राफ को रोकना है, तो उसे महासमुंद जैसी घटनाओं को छोटी बात मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह काफी स्पष्ट चेतावनी है। 
महासमुंद का यह अखाड़ा एक प्रतीक है। उस स्थिति का, जहां पार्टी अपने ही भीतर उलझी हुई है। अगर कांग्रेस को फिर से खड़ा होना है, तो उसे अपने विरोधियों से पहले खुद से लड़ना बंद करना होगा। सच्चाई यही है जब लड़ाई घर के अंदर हो, तो बाहर की लड़ाई जीतना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

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