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कथा का रसपान करते श्रद्धालुओं
कथा का रसपान करते श्रद्धालुओं
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मुचुकुंद उद्धार व रुक्मणी विवाह प्रसंग से श्रद्धालु हुए भावविभोर

ग्राम लभराखुर्द में चल रही भागवत कथा के सातवें दिन कथावाचक पं. सूर्यकांत शास्त्री ने महारास, मुचुकुंद उद्धार और रुक्मणी मंगल विवाह प्रसंग का वर्णन किया।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 10 Apr 2026, 01:20 PM · अपडेट: 18 Sep 2026, 03:31 AM
महासमुंद
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
ग्राम लभराखुर्द में चूड़ामणी चंद्राकर परिवार के यहां चल रही भागवत कथा के सातवे दिन कथावाचक पं. सूर्यकांत शास्त्री ने महारास, मुचुकुंद उध्दार, रुक्मणी मंगल विवाह परंपरा रस्म कथा का रसपान श्रद्धालुओं को कराया। 
पं. सूर्यकांत शास्त्री ने  रुक्मणी मंगल कथा के बारे में बताते हुए कहा कि जो इसका श्रवण करता है, उसके घर में विवाह की सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं और परिवार मंगलमय जीवन व्यतीत करता है। जब-जब संसार में पाप बढ़ेगा, तब- तब कृष्ण के रूप में भगवान प्रकट होकर इस संसार का उद्धार  करेंगे। भगवान कृष्ण की हर लीला में एक गूढ संदेश निहित है। उन्होंने गोवर्धन पर्वत, कंस वध और यशोदा माता द्वारा कृष्ण के दर्शन जैसे प्रसंगो का उल्लेख करते हुए कहा कि यह घटनाएं हमें सिखाती हैं कि जब तक मनुष्य अपने भीतर के अहंकार और नकारात्मकता का नाश नहीं करता, तब तक वह ईश्वर के सच्चे स्वरूप को नहीं जान सकता। 
महारास के बारे मे चर्चा 
इस कथा में श्रद्धालुओं ने आते ही राम बोलो, जाते ही राम बोलो,  सुबह शाम राम बोलो जैसे भजनों पर झूमते हुए भक्ति का आनंद लिया। रुक्मणी मंगल विवाह एवं प्रेम योग के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए महारास के बारे में बताते हुए कहां कि  महारास का अर्थ है जीव से जीव का मिलन नहीं, अपितु  ब्रह्म से जीव के मिलन को महारास कहा गया है। मुचुकुंद  का कृष्ण से भेंट और उध्दार की कथा में बताया कि राजा मुचुकुंद युद्ध में निपुण थे और उन्होंने देवताओं की सहायता के लिए असुरों से लंबा युद्ध लड़ मुचुकुंद  ने कृष्ण को देखा और उनसे भक्ति का वरदान मांगा न कि सांसारिक सुखों का। 
कृष्णा उन्हें दर्शन दिए। उनकी क्षत्रीय जीवन की हिंसा के पाप धोने के लिए तपस्या करने का निर्देश दिया और कहा कि वे अगले जन्म में ब्राह्मण बनेंगे और अंत में परमात्मा को प्राप्त करेंगे। जब जीव में अभियान आता है, तब भगवान से वह दूर हो जाता है। लेकिन जब कोई भगवान की अनुराग के विराह में होता है तो कृष्णा उस पर अनुग्रह करते हैं, उसे दर्शन देते हैं। भगवान कृष्ण रुक्मणी विवाह का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भगवान कृष्ण प्रथम विवाह विदर्भ देश के राजा की पुत्री रुक्मणी को कृष्ण द्वारा हरण कर विवाह किया गया। 
राधा कृष्ण बने बच्चे 
रुक्मणी विवाह की झांकी 
कथा व्यास ने बताया कि रुक्मणी स्वयं साक्षात लक्ष्मी है और वह नारायण से दूर रह  नहीं सकती। रुक्मणी मंगल कथा के बारे में बताते हुए कहां कि जो इसका श्रवण करता हैं। उसके घर में विवाह की सारी बाधाएं दूर हो जाती है। कृष्ण रुक्मणी विवाह की झांकी ने श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर दिया। महिलाओं ने सामूहिक रूप से आरती उतारी और पुष्प वर्षा की। इस मौके पर आयोजन की ओर से आकर्षक वेश भूषा में कृष्ण व रुक्मणी विवाह की झांकी प्रस्तुत कर विवाह संस्कार की रस्मों को पूरा किया। कथा के साथ-साथ भजन संगीत भी प्रस्तुत किया गया। 
इस अवसर पर चूड़ामणी चंद्राकर, नीलमणी चंद्राकर, कौशल्या चंद्राकर, परमेश्वरी चंद्राकर, भूमिका चंद्राकर, बसंती शत्रुघ्न चंद्राकर, उषा चंद्राकर ,उत्तर चंद्राकर, सोमा प्रमोद चंद्राकर, भैया लाल चंद्राकार, श्यामा चंद्राकर, मुन्नी शंकर चंद्राकर, सरस्वती कांतू चंद्राकर, कमला भूषण चंद्राकर, उर्मिला चंद्राकर, साधना किशोर चंद्राकर, मिनी अंगद चंद्राकर, रुचि अंकुर चंद्राकर ,राजा, देव, रूद्र, यथार्थ, हेयांश, पीयूष, यशस्व, गुरदीप, पूर्वाशी, पूनम, रिया, दामिनी साहू आदि उपस्थित थे। उपरोक्त जानकारी कृष्ण कुमार साहू ने विज्ञप्ति में दी है।
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